फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

बुधवार, मार्च 28, 2018

करे तो कैसे करेगा इलाज़ चारागर

निगाहे लुत्फ़ तेरा हो किधर भी जाने जिगर
नज़र से अपनी मगर मेरी तर्फ़ देखा कर

चला तो और ही सू जाने क्यूँ मगर मुझको
है खेंच लाई कशिश तेरी तेरे घर अक़्सर

लगा हो रोग मुहब्बत का फिर भला उसका
करे तो कैसे करेगा इलाज़ चारागर

कहेंगे आप इसे क्या के शब थी सावन की
जला था उसमें मुसल्सल हमारे दिल का नगर

नहीं पता है चला है किधर से ग़ाफ़िल जी
खुबा हुआ है मगर सीने में कोई नश्तर

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मार्च 27, 2018

वही बस एक मुस्काई बहुत है

कहूँ किससे के ग़म भाई बहुत है
यहाँ सबसे शनासाई बहुत है

तो क्या समझूँ इसे इक़रारे उल्फ़त
वो मुझसे आज शरमाई बहुत है

कहाँ मुम्क़िन है उसको भूल पाना
तसव्वुर में वो जो आई बहुत है

मैं सर ले लूँगा उसकी हर बलाएँ
कभी उसकी क़सम खाई बहुत है

न मैं ज़ाहिर करूँगा औरों पर यह
मगर सच है वो हरज़ाई बहुत है

एक क़त्आ-

नहीं इल्ज़ाम है उसपे ये ग़ाफ़िल
के उसके चलते रुस्वाई बहुत है
दिले नादान के लुटने पे मेरे
वही बस एक मुस्काई बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 26, 2018

हादिसे किस क़दर लुभाते हैं

नाज़ अँधेरों के भी उठाते हैं
दीये गोया हमीं जलाते हैं

हैं फ़क़त ख़्वाब ही नहीं वे ख़्वाब
जागे जागे जो देखे जाते हैं

हो न हो ख़ुद को देखने की ताब
आईना लोग पर दिखाते हैं

जो न आते हों सोच उनके लिए
तेरे दिल तक हम आते जाते हैं

कोई ग़ाफ़िल से आके पूछ तो ले
हादिसे किस क़दर लुभाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 25, 2018

तुझे इश्क़ भी जानेजाना सिखा दूँ

तू आ मैं ग़ज़ल गुनगुनाना सिखा दूँ
अकेले में ही मुस्कुराना सिखा दूँ

है तुझमें कशिश बाँकपन है चमिश है
तुझे इश्क़ भी जानेजाना सिखा दूँ

ये माना हैं दिलकश अदाएँ तेरी बस
उन्हें मैं ज़रा सा लजाना सिखा दूँ

गो कोशिश निभाने की तेरी है फिर भी
सलीके से उल्फ़त निभाना सिखा दूँ

मिले कोई ग़ाफ़िल जो मुझसा तो उस पर
लगाते हैं कैसे निशाना, सीखा दूँ

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 22, 2018

ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

मुझे तू भूल जाता है मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं रहता हूँ तेरे दिल में तुझे यह क्या नहीं लगता?

निग़ाहे लुत्फ़ तेरा है उधर रुख़ है इधर ऐसे
मुहब्‍बत आज़माना क्‍या तमाशा सा नहीं लगता?

मैं वापस आ ही जाता हूँ वहीं चलता जहाँ से हूँ
ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

तू होता है जो ग़मगीं रू मेरा भी ज़र्द होता है
फिर अपने बीच तुझको क्यूँ कोई रिश्ता नहीं लगता

घुला हो ज़ह्र कितना भी तेरी शोख़े बयानी में
मैं पी जाता हूँ हँस हँस कर मुझे तीखा नहीं लगता

रक़ीबों पर क़रम तेरा न मेरी जाँ पे आ जाए
तू मेरा है मगर अक़्सर मुझे मेरा नहीं लगता

तेरे आते ही ग़ाफ़िल बज़्म में आ जाती है रौनक़
बताना सच के तुझको क्या कभी ऐसा नहीं लगता?

-‘ग़ाफ़िाल’

यहां क्लिक करें और पढ़ें यह ग़ज़ल अमर उजाला दैनिक पर

शनिवार, मार्च 17, 2018

ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

रुख़ पे उल्फ़त के जो जेवर नहीं देखे जाते
आईने ऐसे भी शब भर नहीं देखे जाते

देखा जाता है महज़ उड़ता है कितना कोई
उड़ने वालों के कभी पर नहीं देखे जाते

ये ही क्‍या कम है के हो जाते हैं जी को महसूस
आप इस तर्फ़ तो अक़्सर नहीं देखे जाते

हो तबस्सुम जो लबों पर तो बने बात भी कुछ
ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

आओ क्यूँ हम भी न इस जश्न में शामिल हो लें
खेल अब इश्क़ के छुपकर नहीं देखे जाते

आएगी वस्ल की शब अपनी भी क्या ग़ाफ़िल जी
आप तो अपने से बाहर नहीं देखे जाते

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 15, 2018

जब मिला तू जामे से बाहर मिला

तूने चाहा था जो वो जी भर मिला
तू ही कह क्या तू भी मुझको पर मिला

आज तक फुटपाथ पर था जी को अब
तू दिखा लगता है सुन्दर घर मिला

रब्त क़ायम हो न पाया गो के तू
आते जाते राह में अक़्सर मिला

शह्रे जाना में गया मैं जब कभी
हर बशर क्यूँ मुझको दीदःवर मिला

कैसे कह पाता मैं ग़ाफ़िल हाले दिल
जब मिला तू जामे से बाहर मिला

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 12, 2018

मैं अपने ज़िस्म के कच्चे मक़ान से भी गया

रहा जो थोड़ा अब उस आन बान से भी गया
मैं तेरे इश्क़ में धरमो ईमान से भी गया

मक़ाम ख़ुल्द था पर हाय री मेरी किस्मत
मैं अपने ज़िस्म के कच्चे मक़ान से भी गया

-‘ग़ाफ़िल’