Wednesday, December 09, 2020

हम हैं फिर प्यार का मुहूरत है


मेरी जानिब से आप सबको दो क़त्आत नज़्र किये जाते हैं मुलाहिज़ा फ़र्माएँ!

1.
है मुसन्निफ़ की कोई जाने ग़ज़ल
या मुसब्बिर की कोई मूरत है
ख़ूबसूरत फ़क़त न कहिए इसे
हुस्न तो इश्क़ की ज़ुरूरत है

2.
देखिए! ग़ौर कीजिए इसपर
बाद अर्से के ऐसी सूरत है
क्या नमूज़ी बताएगा इसको
हम हैं फिर प्यार का महूरत है

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 07, 2020

अच्छा नहीं आया!!

बताएँ क्यूँ के हमको अब तलक क्या क्या नहीं आया
हाँ ये है सामने वाले को भरमाना नहीं आया

जो कहना था न कह पाए हों शायद हम सलीके से
है मुम्क़िन यह भी शायद उनको ही सुनना नहीं आया

अदा क़ातिल है ये भी उनके दर जाओ न तो उनका
बड़ी मासूमियत से बोलना अच्छा नहीं आया!!

कुछ और आसान हो जाता हमारा मरना उल्फ़त में
सुना जाता जो नामाबर के ख़त उनका नहीं आया

यक़ीनन लुत्फ़ आएगा जो चाहो तज़्रिबा कर लो
कोई ग़ाफ़िल कहे जब उनका संदेशा नहीं आया

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 02, 2020

मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

ज़ुनून आने का क्यूँ न जाना हो गर
और आए भी क्या जो हम आकर चले
चलो ख़ैर आए हम अक़्सर यहाँ
मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, November 28, 2020

ऐसे वो शायद इंतकाम लिया

हाँ लिया और सहरो शाम लिया
पर न बोलूँगा मैंने जाम लिया

जो के आता था मेरे ख़्वाबों में रोज़
ऐसे वो शायद इंतकाम लिया

लेना था जी से जेह्न से लेकिन
क़त्ल में मेरे फिर वो काम लिया

शायद इससे ही है ख़फ़ा रब जो
मैंने नाम उसका सुब्हो शाम लिया

ग़ाफ़िल उल्फ़त का रोग तुझको था और
लुत्‍फ़ उसने भी बेलगाम लिया

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, November 22, 2020

कोई तकलीफ़ में आ जाए हम ऐसा नहीं करते

कहा जाए हमें जैसा भले वैसा नहीं करते
मगर करने पे ही आ जाएँ तो क्या क्या नहीं करते

हुआ क़ानून ये क्या इश्क़ फ़र्माना बुरा है क्या
नहीं अच्छा है यह कहना के हम अच्छा नहीं करते

हमारी कोशिशों से हर कोई ख़ुश हो न हो लेकिन
कोई तकलीफ़ में आ जाए हम ऐसा नहीं करते

कोई सूरत हमारे जी में आ जाते हो वैसे फिर
ये कहना क्या के हम तेरी गली आया नहीं करते

भले ग़ाफ़िल हों हम लेकिन हमारे जेह्नो दिल गुर्दे
हो कोई वक़्त अपने काम का हर्ज़ा नहीं करते

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, November 04, 2020

न हो गर आईना सूरत कभी अपनी नहीं दिखती

हैं कहते लोग अब वो तेरी गुस्ताख़ी नहीं दिखती
कहें कैसे हम उनसे यह के हमको भी नहीं दिखती

हमारा क़त्ल करने वाला हमको दिख तो जाता है
मगर नज़रों की थी जो अब वो जासूसी नहीं दिखती

न जाने क्या हुआ है आजकल सारे नज़ारों को
तबीयत है हमारी जैसी वो वैसी नहीं दिखती

हमारी याद अपने साथ रक्खो फ़ाइदा होगा
न हो गर आईना सूरत कभी अपनी नहीं दिखती

भरम होता था ग़ाफ़िल यह के क्या रक्खें किसे छोड़ें
चमन में ख़ुश्बुओं की तब सी रा’नाई नहीं दिखती

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, September 23, 2020

ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में

न यह पूछो के लग जाती है क्यूँकर आग पानी में
ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में
मुझे होना ही गर था इश्क़ तो उससे हुआ क्यूँ जो
मचलती रहती थी हर सिम्त नानी की कहानी में

-‘ग़ाफ़िल’

(चित्र गूगल से साभार)

Friday, September 11, 2020

वो अगर चाहे मक़ाँ मेरा अभी घर कर दे

है क़ुबूल आज मुझे मोम से पत्थर कर दे
मुझपे रब उसकी मुहब्‍बत की नज़र पर कर दे

मेरे अल्‍लाह मुझे भी तो तसल्ली हो कभी
उसके शाने पे कभी भी तो मेरा सर कर दे

वो जो आतिश है जलाती है मुझे शामो सहर
कोई उसको तो मेरे जिस्‍म से बाहर कर देे

मेरे इज़्हारे मुहब्बत पे लगा अपनी मुहर
वो अगर चाहे मक़ाँ मेरा अभी घर कर दे

ऐ ख़ुदा कैसी है उलझी ये डगर उल्‍फ़त की
अपने ग़ाफ़िल के लिए कोई तो रहबर कर दे

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, August 31, 2020

वो ख़ुद नहीं हैं आए है आया सलाम पर

ये भी तो कम नहीं है मुहब्बत के नाम पर
वो ख़ुद नहीं हैं आए है आया सलाम पर
जारी रहेगा ऐसे भी उल्फ़त का कारोबार
होता रहे जो होगा असर ख़ासोआम पर

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, August 20, 2020

क्यूँ न आज और ख़्वाब और भी हैं

ज्यूँ हो तुम बेहिज़ाब और भी हैं
मेरे सदके जनाब और भी हैं

तुम न इतराओ इस क़दर तुमको
इल्म हो माहताब और भी हैं

वो मुख़ातिब था तुमसे ठीक है पर
इश्क़ में कामयाब और भी हैं

क्या तुम्हीं ख़्वाबों से हो वाबस्ता
ऐसा है मह्वेख़्वाब और भी हैं

यूँ जो तुम आँखें फेर लेते हो
सोच लो पुरशबाब और भी हैं

शह्र में देखता हूँ मेरे सिवा
यार ख़ानाख़राब और भी हैं

रोज़ बा रोज़ क्यूँ मेरा ग़ाफ़िल
क्यूँ न आज और ख़्वाब और भी हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, August 19, 2020

कोई तो साथ निभाने आए

आए कोई भी बहाने आए
कोई फिर मुझको सताने आए

राहे उल्फ़त है कठिन गो फिर भी
कोई तो साथ निभाने आए

आप इक पल से ही ऊबे हो मियाँ!
अपने आगे तो ज़माने आए

शुक्र है ज़ेह्न तो है अपने साथ
वर्ना कितने हैं बनाने आए

काश! ग़ाफ़िल जी वो पा जाएँ आप
हम फ़क़ीरों से जो पाने आए

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, August 15, 2020

ये है ग़लत के हमेशा इधर उधर देखो

बुरी हो शै जो भले ही वो मुख़्तसर देखो
किसी भी चीज़ को देखो मगर अगर देखो

गो चार सू हैं नज़ारे नज़र पे काबू हो पर
ये है ग़लत के हमेशा इधर उधर देखो

अब इधर देखोगे क्यूँ हाँ मगर दुआ है मेरी
खिले हों फूल उधर तुम जिधर जिधर देखो

ये आसमान है महफ़ूज़ तुम कहे थे अब
कटे पड़े हैं परिंदों के जो ये पर देखो

न होगा साथ सफ़र में कोई भी ग़ाफ़िल जी
तमाम शह्र तुम्हारा है वैसे गर देखो

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, August 14, 2020

लफ़्ज़े इफ़्रात और है साहिब!

औरों की बात और है साहिब!
अपनी औक़ात और है साहिब!!

ठीक है कुछ नहीं पे कुछ, फिर भी
लफ़्ज़े इफ़्रात और है साहिब!

रात ये है के बस गुज़र जाए
वस्ल की रात और है साहिब!

जिसमें लुत्फ़ आए मिलने वालों को
वो मुलाक़ात और है साहिब!

एक ग़ाफ़िल से जो करा ले काम
वो करामात और है साहिब!!

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, August 11, 2020

पुर्ज़ा पुर्ज़ा हो गया

क्या हुई तेरी नज़र तिरछी के क्या क्या हो गया
कोई साँस अटकी कोई दिल पुर्ज़ा पुर्ज़ा हो गया

जी आवारा मेरा कुछ यूँ रह रहा अब मेरे साथ
ये भी सुह्बत में तेरी तेरे ही जैसा हो गया

मैं बहुत ही शाद हूँ और हाँ रक़ीबों का मेरे
जानता हूँ तेरे दिल में आना जाना हो गया

मुझको लगता है के इश्क़ अपना भी बेमानी ही है
देखता हूँ ये भी कितना तेरा मेरा हो गया

टूटते रिश्ते की ग़ाफ़िल फ़िक़्र भी गर हो तो क्यूँ
शह्र में जब मजनूँ वाला अपना रुत्बा हो गया

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, August 06, 2020

फ़साना मेरा मुख़्तसर देखते हो

तुम्हें भी लगेगा अगर देखते हो
हैं क्या क्या ये जो चश्मेतर देखते हो

दिखे भी तो क्यूँ उम्र भर की मुहब्बत
जो कुछ पल का हुस्न उम्र भर देखते हो

है गोया मुक़द्दस न जाने मगर क्यूँ
फ़साना मेरा मुख़्तसर देखते हो

गर इंसान हो तो फ़क़त ख़ामियाँ ही
नहीं देखनी थीं मगर देखते हो

वो चेहरा नहीं चाँद है मेरे ग़ाफ़िल
उसे क्यूँ नहीं भर नज़र देखते हो

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 28, 2020

अर्से के बाद आए वो देखो तो क्या लिए

कुछ लानतें मलामतें शिक़्वा गिला लिए
अर्से के बाद आए वो देखो तो क्या लिए
फ़िलहाल इश्क़ वाली हरारत रहे बनी
कम तो न था सबब ये, जो हम जी जला लिए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 27, 2020

अपने दम पे नाम कमाना होता है

जी का दुखना मैंने माना होता है
पर सच है क्या प्यार दीवाना होता है

दिखता नहीं है चाँद आजकल अब उसका
किस कूचे में आना जाना होता है

अक़्सर पाता हूँ मैं, राहे उल्फ़त में
उसका बोझ और अपना शाना होता है

इश्क़ में शिक़्वे बाइस हैं रुस्वाई के
अपने दम पे नाम कमाना होता है

ग़ाफ़िल और अब कितनी आवारागर्दी?
अब्रों का भी एक ठिकाना होता है

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, July 26, 2020

ज़िन्दगी वैसे फ़साना है हुज़ूर

आप क्या आपको जाना है हुज़ूर!
मेरे आगे तो ज़माना है हुज़ूर!!

लुत्फ़ ले पाएँ न ये आप पे है!
ज़िन्दगी वैसे फ़साना है हुज़ूर!!

ये नहीं हुस्न है निखरेगा कुछ और
इश्क़ जितना ही पुराना है हुज़ूर

एक क़त्अ-

जाने दे आऊँगा फिर ये कहना
जी बुझाने का बहाना है हुज़ूर
ज़िन्दगी ऐसे नहीं चलती है पर
गो हैं सच आप ये माना है हुज़ूर

गुल ही क्या आज तो ये पूरा चमन
एक ग़ाफ़िल का दीवाना है हुज़ूर

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, July 22, 2020

हाँ मगर वह आप सा प्यारा लगे

आप औरों को न जाने क्या लगे
पर हमें तो वाक़ई सपना लगे

हो कोई भी इश्क़ तो कर लेंगे हम
हाँ मगर वह आप सा प्यारा लगे

ज़ह्र से निभ जाती हम आबे हयात
क्या करें जब ज़ह्र सा कड़वा लगे

वर्ना हो कुछ भी हमें परवाह क्या
गुल है तो फिर आपके जैसा लगे

या लगे पूरा का पूरा जिम्मेदार
या तो ग़ाफ़िल पूरा आवारा लगे

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 21, 2020

क्या ज़ुरूरी है वो हमारे हों

चाह ये है जो चाँद तारे हों
सारे के सारे बस हमारे हों

जाग जाओगे छोड़ जाएँगे
ख़्वाब कितने भले ही प्यारे हों

अब ज़रा भी न टाला जाएगा
आज उल्फ़त के वारे न्यारे हों

क्या लुभाएगा उनको शब का शबाब
दर्द में दिन न जो गुज़ारे हों

हम हुए उनके हमको होना था
क्या ज़ुरूरी है वो हमारे हों

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, July 18, 2020

मेरे ग़ाफ़िल से मुझे प्यार हुआ जाता है

तू तो अब ख़्वाबों के भी पार हुआ जाता है
बोल क्या ऐसे भी लाचार हुआ जाता है

सोचा है जबसे के अब कुछ तो हो शिक़्वा तुझसे
जी मेरा मुझसे ही दो चार हुआ जाता है

उम्र कैद ऐसे तो हो पाई नहीं है ये कसक
हाँ तेरे इश्क़ में अब दार हुआ जाता है

होश गुम तेरे हैं इज़्हारे मुहब्बत पे मेरे
देखता हूँ के तू बीमार हुआ जाता है

तू भी कह लेता मगर कह न सका यार के अब
मेरे ग़ाफ़िल से मुझे प्यार हुआ जाता है

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 30, 2020

आदमी है आदमी अपनी बदौलत

ले लो ये बज़्मे सुखन वाली रियासत
मुँह नहीं ही लगने की अपनी है आदत

कुछ न पाओगे तग़ाफ़ुल करके मुझसे
सोचते हो गर के मिल जाएगी इश्रत

क्यूँ किसी को इश्क़ में रुस्वा करूँ पर
कर तो सकता हूँ मैं गो ऐसी हिमाक़त

है ज़ुरूरी यह के याद इतना रहे ही
आदमी है आदमी अपनी बदौलत

ढूँढते ग़ाफ़िल हैं सारे इश्क़ में क्या
इश्क़ है ख़ुद आप ही में जबके नेमत

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 23, 2020

अभी भी है कुछ अच्छा देखने को

न पूछ आया यहाँ क्या देखने को
बता अब क्या है रक्खा देखने को

थी ख़्वाहिश देखने की तेरा चेहरा
मगर मिलता है क्या क्या देखने को

यहाँ हर शै है संज़ीदा बहुत ही
मैं आया था तमाशा देखने को

सुक़ून आया नहीं अब तक जो शायद
अभी भी है कुछ अच्छा देखने को

न आता मैं सदा जो ये न आती
के ग़ाफ़िल अब चला आ देखने को

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 10, 2020

कोई अपना ही दूसरा समझे

😔

तू ही जो मुझको ग़ैर समझा है फिर
क्यूँ न दुनिया मुझे तेरा समझे
जीना चाहे भी कोई क्यूँ जब उसे
कोई अपना ही दूसरा समझे

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, May 20, 2020

बीच रस्ते मील का पत्थर पुराना आ गया

हाँ मुझे बातें बनाना मैंने माना आ गया
उसको भी तो तानों का थप्पड़ चलाना आ गया

शम्स की ताबानी का फ़िक़्र अब नहीं है मुझको फिर
गाँव के बरगद का सर पे शामियाना आ गया

क़ाश! मेरे सर पे भी होता कोई ग़म का पहाड़
हर तरफ़ ग़मख़्वार हैं ऐसा ज़माना आ गया

दूर बिल्कुल भी नहीं थी मंज़िल अबके हाय पर
बीच रस्ते मील का पत्थर पुराना आ गया

है रुआबे पा के उसपर झुक रहे सर ख़ुद-ब-ख़ुद
झूठ है ग़ाफ़िल के तुझको सर झुकाना आ गया

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, May 13, 2020

कुछ तो न पाया सब कुछ पाकर लगता है

लगना नहीं चाहिए था पर लगता है
इश्क़ अदावत से भी बदतर लगता है

सोकर देखे जाने वाले से ज़्यादा
सपना जगे ही देख तू, बेहतर लगता है

हूँ क़तील मैं ही और अब इल्ज़ाम इसका
आने को है मेरे ही सर, लगता है

मैं भी कह देता हूँ मैंने वफ़ा न की
तुझको जानम ऐसा ही गर लगता है

तूने जीती दुनिया मैंने प्यार उसका
बोल के तुझको कौन सिकन्दर लगता है

कोई सहारा हो न अगर तो ऐसे में
रस्ते का पत्थर भी रहबर लगता है

इस दुनिया की यही रीति है ग़ाफ़िल जी
कुछ तो न पाया सब कुछ पाकर लगता है

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, May 11, 2020

हुज़ूर आपके आने से जी बहलता है

ये सच है आपके ताने से जी बहलता है
मेरा किसी भी बहाने से जी बहलता है

नहीं कहूँ गर इसे इश्क़ तो कहूँ क्या जब
कोई भी तौर सताने से जी बहलता है

मैं शाद हूँ के नहीं छोड़िए इसे हाँ मगर
हुज़ूर आपके आने से जी बहलता है

तमाम होंगे सताए हुए ज़माने के
मैं हूँ के जिसका ज़माने से जी बहलता है

नया है जो जो उसे ग़ाफ़िल और जाँच परख
है तज़्रिबा के पुराने से जी बहलता है

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, May 10, 2020

क्यूँ कहूँ मैं के भला आप तो आते रहिए

कौन कहता है के ता’उम्र किसी के रहिए
हाँ ज़ुरूरी है मगर यह भी के अपने रहिए

दुख की घड़ियाँ ही बताती हैं के सुख चैन के वक़्त
आप सब लोग सुलह-साट से कैसे रहिए

ठौर ये यूँ भी नहीं है के रहें हरदम आप
इक नया ठौर कोई और तलाशे रहिए

अंजुमन आपकी है लुत्फ़ भी है आपका ही
क्यूँ कहूँ मैं के भला आप तो आते रहिए

वार होना ही है जो मौका मिला ग़ाफ़िल जी!
हुस्न वालों से तो हरहाल सँभलते रहिए

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, April 18, 2020

कभी जीतकर कभी हारकर

न था इल्म यह के गुनाह कर दिया मैंने यूँ तुझे प्यार कर
मेरे यार तुझसे है इल्तिज़ा न करे मुआफ़ तो दार कर
जो कहे तू है ये गुनाह तो ये गुनाह मेरा शग़ल रहा
मुझे जो जँचा उसे पा लिया कभी जीतकर कभी हारकर

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 27, 2020

शब भी जाती है पर सहर करके

क्या मिला इसको मुख़्तसर करके
लुत्फ़ था ज़ीस्त का सफ़र करके

मेरे जी को कभी न जी समझा
वो जो रहता है जी में घर करके

ख़्वाहिश अपनी कभी तो हो पूरी
जाए मुझको भी कोई सर करके

न मिला जो मुक़ाम जीते जी
पाते देखा है उसको मर करके

जाए जब तो ख़बर करे न करे
आए कोई तो बाख़बर करके

कोई हँसता है दर-ब-दर होकर
कोई रोता है दर-ब-दर करके

ग़ाफ़िल ऐसे ही जाना क्या जाना
शब भी जाती है पर सहर करके

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, March 19, 2020

के आप आ मिलोगे किसी रास्ते पर

मनेगी ख़ुशी आज यह मैक़दे पर
न आना था उनको जनाब आ गए पर

जो कुछ देखने सा हो उसको भले ही
नहीं देखने का हो जी देखिए पर

कहाँ जा सके जिस जगह लोग बोले
जहाँ थी मनाही वहाँ हम गए पर

है दानाई तो है मुनासिब के सोचें
न रोना पड़े ताके अपने किए पर

हुज़ूर अपनी ज़ीनत का क्या कीजिएगा
लगी हैं जो पाबंदियाँ देखने पर

बस इस ही सबब हम नहीं थम रहे हैं
के आप आ मिलोगे किसी रास्ते पर

था उल्फ़त का वह और ही दौर ग़ाफ़िल
हुए थे फ़िदा हम भी जब आईने पर

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, March 14, 2020

जो दिख नहीं रहा हूँ वो तो शर्तिया हूँ मैं

पूछो न रोज़ रोज़ के आख़िर में क्या हूँ मैं
सोचो तो सारे मर्ज़ की वैसे दवा हूँ मैं

मौसम कोई भी दिल का हो आओगे पास तो
पाओगे तपते जेठ में पुरवा हवा हूँ मैं

जैसे भी हो वो तुम हो मुझे क्यूँ हो फ़िक़्रो ग़म
कहना ये क्या है बोलो के तुझसे ख़फ़ा हूँ मैं

जो दिख रहा हूँ उसपे हमेशा उठा सवाल
जो दिख नहीं रहा हूँ वो तो शर्तिया हूँ मैं

ग़ाफ़िल रहे हैं वो ही जो कहते रहे हैं यार
आ जा न पास मेरे तेरा आसरा हूँ मैं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 13, 2020

वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

उसका हो क्या के उनके बिन महरूम
आजतक हम जो दस्तो पा से रहे
उनको रहना न वैसे रास आया
वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Thursday, March 05, 2020

लगी है चोट दिल पर और ये सर पर समझता है

भले अपना तू कह कितना मगर क्या घर समझता है
मुसल्सल हाले दिल तो मील का पत्थर समझता है

समझ में यह नहीं आता के रस्ते का खटारापन
सने ख़ूँ से ये मेरे पा के यह रहबर समझता है

दिखावे के लिए कर ले तग़ाफ़ुल ठीक है गोया
मुझे है इल्म तू जी की मेरे जी भर समझता है

नहीं समझा कहे कितना भी ये माना न जाएगा
तुझे अपना बनाना मेरा तू बेहतर समझता है

जो सर पे हाथ फेरे जा रहा ग़ाफ़िल है चारागर
लगी है चोट दिल पर और ये सर पर समझता है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, February 26, 2020

चलूँ कहाँ से मेरा रास्ता कहाँ निकले

न यूँ हुआ है के घर हर कोई मक़ाँ निकले
के गर हो आग यक़ीनन वहाँ धुआँ निकले

तभी कहूँगा के आया है लुत्फ़ मुझको भी गर
ज़मीन खोदूँ मैं और उससे आसमाँ निकले

किसी भी दौर में कोई कहीं भी कैसी भी
पढ़े किताब तेरी मेरी दास्ताँ निकले

कुछ ऐसी बात है मुझमें के है नसीब मेरा
पहुँच गया तो बियाबाँ भी गुलसिताँ निकले

न इल्म होगा ख़ुदा को भी यह के मैं ग़ाफ़िल
चलूँ कहाँ से मेरा रास्ता कहाँ निकले

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, February 20, 2020

ग़ाफ़िल अपनी डाल पे ही पर चलाना सीख ले

ख़ुश है रहना गर तरीक़ा हर पुराना सीख ले
या कोई सूरत निकाल और आज़माना सीख ले

गा न वह जो ठीक है ग़ाफ़िल नहीं अब यह चलन
जो सभी को भाए वो ही गीत गाना सीख ले

मंज़िल उल्टी सीधी हो ग़ाफ़िल ही हो गर हमसफ़र
फिर तू उल्टी सीधी रह पर आना जाना सीख ले

बात नखरों से भी बन जाती है ग़ाफ़िल आजकल
ऐसे जैसे तैसे नखरा ही दिखाना सीख ले

धूल के इस आसमाँ में भर नहीं सकता उड़ान
ग़ाफ़िल अपनी डाल पे ही पर चलाना सीख ले

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Tuesday, February 18, 2020

या तेरे सीने में ग़ाफ़िल आग भर है

शम्स है सिरहाने या छत पर क़मर है
फ़र्क़ है क्या रोज़ो शब सोना अगर है

क्यूँ नहीं उठ सकती आह आख़िर ज़माने!
जो कटा शब्जी नहीं है एक सर है

नींद अगर आए न तो क्यूँकर न आए
मैं हूँ बिस्तर में ही यार और अपना घर है

गुफ़्तगू बेबाक होनी चाहिए थी
किसलिए शरमा रहा था इश्क़ अगर है

मुस्कुरा दे कुछ के जी में आए ठंढक
या तेरे सीने में ग़ाफ़िल आग भर है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, February 12, 2020

सोचता हूँ के इधर ज़िन्‍दगी कैसी होगी

हिज्र के साथ कभी वस्ल अगर अपनी होगी
जानता हूँ ये मुलाक़ात भी अच्छी होगी

वो है एहसान फ़रामोश मैं एहसान शनास
उसकी दुनिया में मेरी पैठ ही कितनी होगी

जी रहा शौक से जी हाँ ये मगर याद रहे
ज़ीस्त के साथ चली मौत भी आती होगी

अच्‍छा ख़ासा था अभी हो जो गया मैं शाइर
सोचता हूँ के इधर ज़िन्‍दगी कैसी होगी

एक ग़ाफ़िल पे ये एहसाने क़रम हो के न हो
लोग कहते हैं कभी जानेमन अपनी होगी

-‘ग़ाफ़िल’

गाँव का बूढ़ा वो पीपल का शजर आता है

बाबते ज़िक़्र ही सच है के वो घर आता है
किसके कोठे पे भला रोज़ क़मर आता है

करता रहता है वो एहसान सभी पर बेशक
उसको एहसान जताना भी मगर आता है

वक़्त के पार चले जाते हैं वे लोग अक़्सर
जिनको थोड़ा सा भी जीने का हुनर आता है

बेवफ़ाई का गिला मुझको भला क्यूँ हो जब
वह तसव्वुर में मेरे शामो सहर आता है

झूठे ही हैं वो जो भी क़त्ल का इल्ज़ाम अपने
कहते रहते हैं के बस उनके ही सर आता है

दर्दे उल्फ़त से है आँखों में ये सैलाब ओफ्फो!!
मैं भी देखूँगा उसे मुझ तक अगर आता है

पेड़ भी चलते हैं ग़ाफ़िल जी! मेरे ख़्वाबों में
गाँव का बूढ़ा वो पीपल का शजर आता है

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, February 11, 2020

कुछ भी करो तुम उसका मेरी जान ही तो है

फैली है कम भी होगी कभी शान ही तो
निकलेगा रह भी जाएगा अरमान ही तो है

रहने दो वह जहाँ है के उसको निकाल दो
कुछ भी करो तुम उसका मेरी जान ही तो है

बोलो तो छोड़ ही दूँ मैं उल्फ़त का सिलसिला
मेरे ख़ुशी से जीने का सामान ही तो है

जी में ही गर उठा है तो इतना बुरा भी क्या
उट्ठा है बैठ जाएगा तूफ़ान ही तो है

ग़ाफ़िल अगर पढ़ा तो वफ़ा की बस इक किताब
इसको कहाँ है अक़्ल परेशान ही तो है

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, February 07, 2020

हाँ मगर पल्लू सरक जाए ज़ुरूरी तो नहीं

कोई जब गाए ग़ज़ल गाए ज़ुरूरी तो नहीं
मैं कहूँ वह जो तुझे भाए ज़ुरूरी तो नहीं

फूल महकाता है पूरा गुलसिताँ बस इस सबब
वो मेरा दामन भी महकाए ज़ुरूरी तो नहीं

यह ज़ुरूरी है के रो लें रोने का जब जी हो पर
आँख से आँसू निकल जाए ज़ुरूरी तो नहीं

अच्छे दिन का हम सभी को इंतिज़ार इतना है पर
कोई दिन वह सामने आए ज़ुरूरी तो नहीं

ठीक है ग़ाफ़िल हूँ रफ़्तारे हवा भी ठीक है
हाँ मगर पल्लू सरक जाए ज़ुरूरी तो नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, February 04, 2020

पर लोग समझते हैं के गाने के लिए है

आदाब! ये लीजिए मतला, शे’र और मक़्ता गरज़ यह के ग़ज़ल मुक़म्मल हुई-

है सच के ये दुनिया तो दीवाने के लिए है
कुछ लोगों का आना फ़क़त आने के लिए है

तू देख ज़माना ही है इस ज़ीस्त की बाबत
मत सोच के यह ज़ीस्त ज़माने के लिए है

मेरी ये ग़ज़ल जीने का गो तौर है ग़ाफ़िल
पर लोग समझते हैं के गाने के लिए है

-‘ग़ाफ़िल’
(पृष्‍ठभूमि चित्र गूगल से साभार)

Monday, February 03, 2020

मेरी रात आज भी कँवारी है

ये जो उल्फ़त है तेरी मेरे लिए
बस ज़रा सी है या के सारी है?
इश्क़बाजी के फेर में ग़ाफ़िल!!
मेरी रात आज भी कँवारी है

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Wednesday, January 29, 2020

अपने देखे भाले कौन

कौए से बोली कोयल
तुम गोरे तो काले कौन
तुम्हें भी जान न पाऊँ तो
अपने देखे भाले कौन

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, January 27, 2020

तेरे पास ग़ाफ़िल वो शाना कहाँ है

वे लोग उनका आबाद ख़ाना कहाँ है
न पूछ आज बीता ज़माना कहाँ है

जो पाया उसे खोना आसान है पर
जो खोया उसे फिर से पाना कहाँ है

थी आगे मेरी अंजुमन तेरी मंज़िल
मगर अब तेरा आना जाना कहाँ है

मैं उठ तो रहा आस्ताँ से तेरे अब
इधर क्या पता आबोदाना कहाँ है

एक क़त्आ-

वो गर्मी की रात उस ज़माने की, छत का
फ़लक़ वाला वो शामियाना कहाँ है?
वो तारों को गिनने के बेजा बहाने
कनअँखियों का दिलक़श निशाना कहाँ है

न कर ये उठा ले जो ग़म हर किसी का
तेरे पास ग़ाफ़िल वो शाना कहाँ है

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल सेे साभार)

Saturday, January 25, 2020

ग़म थे जो रक़म हुए

आदाब दोस्तो!

क्या करें भी याद कर यह के दौरे इश्क़ में
हमपे क्या सितम हुए और क्या क़रम हुए
बस उसी ही नाज़ से आज भी रहे सता
हिज्र वाली रात में ग़म थे जो रक़म हुए

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, January 22, 2020

आगे जी में थी अब तो जी पर है

गोया इल्ज़ाम क़त्ल का सर है
मेरे हिस्से में आबरू पर है

हैं सभी दिल से मेरे वाबस्ता
कोई अन्दर तो कोई बाहर है

इश्क़ अगर है तो यह भरम ही क्यूँ
के जो जीता वही सिकन्दर है

मुस्कुराऊँ भी तो कहा जाए
तेरी ग़ल्ती यहाँ सरासर है

ग़ाफ़िल उल्फ़त का ज़िक़्र ही मत कर
आगे जी में थी अब तो जी पर है

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, January 19, 2020

मेरी तन्हाईयों का होता है सौदा अक़्सर

मेरा लहज़ा तो रहा सीधा व सादा अक़्सर
जाने क्यूँ लोग समझ लेते हैं पर क्या अक्सर

कोई क्या मुझको ख़रीदेगा मगर ये तो है
मेरी तन्हाईयों का होता है सौदा अक़्सर

जिस्म के पुर्ज़ों की आवारगी भी देखी है
जब जिसे होना जहाँ था वो नहीं था अक़्सर

यूँ नज़ारे तो हमेशा थे किए सर ऊँचा
मैंने नज़रों को ही झुकती हुई देखा अक़्सर

चाँद हो या न हो ग़ाफ़िल को गरज़ क्या आख़िर
रात भर ढूँढना पड़ता है उजाला अक़्सर

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, January 13, 2020

ग़ाफ़िल जी बादलों के भला पार कौन है

मत पूछिए के इश्क़ में लाचार कौन है
यह देखिए के अस्ल गुनहगार कौन है

गोया के चारसू है गुलों की जमात पर
चुभता है मेरे जी में वो जो ख़ार, कौन है

अब तक न जान पाया के दर्या-ए-इश्क़ में
मुझको डुबा दिया जो मेरा यार, कौन है

होता है इश्क़ ख़ुश हो जब अपना दिलो दिमाग़
उल्फ़त के कारोबार में बीमार कौन है

दिखता नहीं है वैसे जो महसूस हो रहा
ग़ाफ़िल जी बादलों के भला पार कौन है

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, January 11, 2020

शायद

दो शे’र-

गुफ़्तगू हो भी अगर तो कैसे
हर कोई ऊब गया है शायद

आह ये ख़ुश्बू! इसी राह से ही
मेरा महबूब गया है शायद

-‘ग़ाफ़िल’