🔥राख कर देती है छू भर जाए ग़ाफ़िल जिस्म से
आग की हर इक लपट आँखों को पर भाती है खूब🔥
नमन् साथियो! गणित तो आती नहीं कि गिनकर बताऊँ कितना साल हुआ पर सन् 1988 का आज ही का रोज़ था जब ढोल बाजे के साथ उत्सव मनाते हुए मुझे भी अर्द्धांगिनी के रूप में यह हसीन तोहफ़ा प्राप्त हुआ था
-‘ग़ाफ़िल’