फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

बुधवार, अप्रैल 25, 2018

है क़रार आता मुझे क़ातिल तेरे तक़रार से

जल रहा था शह्र मैं पूछा के यह कैसे हुआ
सब कहे भड़की है आतिश तेरे हुस्ने यार से

यूँ तग़ाफ़ुल से सुक़ूनो अम्न जाता है मेरा
है क़रार आता मुझे क़ातिल तेरे तक़रार से

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अप्रैल 22, 2018

देखना चाहेगा अंदाज़े वफ़ा और अभी

कम भी था क्या के तमाशा जो हुआ और अभी
बात कुछ और है लहजा है तेरा और अभी

और अभी मेरे तसव्वुर में तुझे रहना है
होना रुस्वा है तेरा अह्दे वफ़ा और अभी

इश्रतें हुस्न की तेरी हों मुबारक तुझको
अपनी तक़्दीर में है शिक्वा गिला और अभी

इश्क़ बेबाकियों का होता है मोहताज कहाँ
क्यूँ कहा फिर के तू आ खुलके ज़रा और अभी

इल्म तो होगा ही पर फिर भी बता क्या ख़ुद का
देखना चाहेगा अंदाज़े जफ़ा और अभी

तेग़ उठाया ही था वह पूछा मज़ा आया क्या
क़त्ल कर कहता है आएगा मज़ा और अभी

ऐसे अश्आर जो पचते ही नहीं हैं ग़ाफ़िल
लाख इंकार पे क्यूँ तूने कहा और अभी

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अप्रैल 21, 2018

गो हम आस पास होंगे

कभी मझको भूल जाना गो हम आस पास होंगे
कभी तुम न याद आना गो हम आस पास होंगे

अभी ख़्वाबों में तुम्हारे कई लोग आएँगे जी
मुझे अब न तुम बुलाना गो हम आस पास होंगे

कहीं जी मचल न जाए मैं न सुन सकूँगा अब और
यूँ तुम्हारा गुनगुनाना गो हम आस पास होंगे

कभी खिल भी जाएँ गुंचे हो भी ख़ुश्बुओं का मेला
ये न चाहेगा ज़माना गो हम आस पास होंगे

चले आज तीर ग़ाफ़िल नहीं आगे फिर लगे या
न लगे कभी निशाना गो हम आस पास होंगे

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अप्रैल 18, 2018

अक़्ल अपनी ठिकाने लगी

मैं उसे आज़माने लगा
वह मुझे आज़माने लगी
देख ताबानी-ए-रुख़ तेरी
अक़्ल अपनी ठिकाने लगी

-‘ग़ाफ़िल’

रात तन्हा मगर गुज़रती है

जिस्म जलता है जाँ तड़पती है
मौत आ जा कमी तेरी ही है

जिसको गाया नहीं कोई अबतक
वो ग़ज़ल ज़िन्दगी की मेरी है

जाके देखेगा होगा तब मालूम
है वो मंज़िल के उसके जैसी है

इतने अह्बाब हैं तेरे ग़ाफि़ल
रात तन्हा मगर गुज़रती है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 17, 2018

है बड़ी चीज़ आप का होना

कोई कहता है आग सा होना
कोई कहता है जलजला होना
मैंने क्या क्या न हो के देख लिया
है बड़ी चीज़ आप का होना

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 16, 2018

सब तराने वो जो हम गाए थे

पास इतने भी कभी आए थे
यूँ के हम जाम भी टकराए थे
याद हों या के न हों तुमको अब
सब तराने वो जो हम गाए थे

-‘ग़ाफ़िल’

ग़ैर चाहे भी तो क्या लूटे हमें

फिर भी शिक़्वा है कहाँ उनसे हमें
गो गए छोड़ हर इक अपने हमें

साथ उनके ही शबे हिज़्र बहुत
उनके अश्वाक़ भी याद आए हमें

मेरे अपनों ने है ऐसे लूटा
ग़ैर चाहे भी तो क्या लूटे हमें

-‘ग़ाफ़िल’

(अश्वाक़=शौक़ का बहुवचन)

पाँवों पे वो सर रख दिए

पास उनके था बहुत ही शाद पर जाने वो क्यूँ
मेरे पल्लू में मेरा दिल आज लाकर रख दिए

मर्तबा अपना मुझे उस दम खिसकता सा लगा
जिस घड़ी रोकर मेरे पाँवों पे वो सर रख दिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अप्रैल 11, 2018

चारःगरी

चारःगरी ये हाय री चारःगरी ये हाय
चारःगरी ये हाय के बीमार कर दिया
वह शख़्स ही है वैसे मेरे दिल का डाक्टर
नज़रों का तीर दिल के था जो पार कर दिया

-‘ग़ाफ़िल’

भूत सेल्फ़ी का

सर पे है चढ़ा तेरे जो सेल्फ़ी का मेरी जाँ
ये भूत किसी तौर उतर जाए तो अच्छा

-‘ग़ाफ़िल’

आत्मविमुग्धता

आत्मविमुग्धता-

सोचा था हमसे होगी न रुस्वाई प्यार की
पर ख़ुद से ख़ुद का इश्क़ छुपाया नहीं गया

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 09, 2018

प्यार का हो सके तो नशा कीजिए

क्यूँ कहूँ मैं के क्या हुस्न का कीजिए
हो सके इश्‍क़ का भी भला कीजिए

छा गये आप ज़ेह्नो जिगर पर भले
और अब कुछ न जी का बुरा कीजिए

मैं तो हँसता हूँ हालते नाज़ुक पे भी
आप रो क्यूँ रहे हैं हँसा कीजिए

इसकी फ़ित्रत है कब ले ले आगोश में
हुस्न को देखते ही रहा कीजिए

रोकता है ज़़मीर और जी कह रहा
आप भी ज़िन्दगी में मज़ा कीजिए

हाँ ये माना नशा है बुरी चीज़ पर
प्यार का हो सके तो नशा कीजिए

आप हैं तो मगर ठीक यह भी नहीं
है के हर वक्‍़त ग़ाफ़िल रहा कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अप्रैल 08, 2018

पर न ऐसा है के बेहतर हो गया हूँ

कह रहा क्यूँ तू के निश्तर हो गया हूँ
तेरी सुह्बत में वही गर हो गया हूँ

ज़ेह्नो दिल अपने भी पत्थर हो चुके मैं
हर तरह तेरा सितमगर हो गया हूँ

लग रहा मुझको भी मैं आशिक़ मुसल्सल
हिज़्र की आतिश में तपकर हो गया हूँ

सबके दिल में आना जाना क्या हुआ है
अपने ही दिल से मैं बाहर हो गया हूँ

तब न था मशहूर ऐसे ज़िन्दा था जब
जैसे मैं मशहूर मरकर हो गया हूँ

बढ़ गई होंगी मेरी रुस्वाइयाँ कुछ
पर न ऐसा है के बेहतर हो गया हूँ

ख़ुद से मैं ग़ाफ़िल था लेकिन होशियार अब
तेरे नक़्शे पा पे चलकर हो गया हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 03, 2018

इतने अरमाँ हुए शहीद जो महफ़िल एक सजाने में

बात है पल भर की ही तेरा मेरे जी तक आने में
बात बड़ी है ख़र्च हो जो ऐ ज़ालिम तुझे भुलाने में

अपने छत पर ही मैं अक़्सर चाँद बुला लेता हूँ पर
ख़तरा बहुत अधिक है यारो ऐसे उसे बुलाने में

सब कुछ पता है फिर भी तेरे मुँह से सुनना चाहूँगा
यह के हैं कितने झूठ जज़्ब जाने के तेरे बहाने में

अपना आना जाना गो हो जाता है अक़्सर वैसे
मुश्किल आती ही है किसी के दिल तक आने जाने में

सजी सजाई महफ़िल आखि़र अच्छी लगे न क्यूँ ग़ाफ़िल
इतने अरमाँ हुए शहीद जो महफ़िल एक सजाने में

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मार्च 28, 2018

करे तो कैसे करेगा इलाज़ चारागर

निगाहे लुत्फ़ तेरा हो किधर भी जाने जिगर
नज़र से अपनी मगर मेरी तर्फ़ देखा कर

चला तो और ही सू जाने क्यूँ मगर मुझको
है खेंच लाई कशिश तेरी तेरे घर अक़्सर

लगा हो रोग मुहब्बत का फिर भला उसका
करे तो कैसे करेगा इलाज़ चारागर

कहेंगे आप इसे क्या के शब थी सावन की
जला था उसमें मुसल्सल हमारे दिल का नगर

नहीं पता है चला है किधर से ग़ाफ़िल जी
खुबा हुआ है मगर सीने में कोई नश्तर

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मार्च 27, 2018

वही बस एक मुस्काई बहुत है

कहूँ किससे के ग़म भाई बहुत है
यहाँ सबसे शनासाई बहुत है

तो क्या समझूँ इसे इक़रारे उल्फ़त
वो मुझसे आज शरमाई बहुत है

कहाँ मुम्क़िन है उसको भूल पाना
तसव्वुर में वो जो आई बहुत है

मैं सर ले लूँगा उसकी हर बलाएँ
कभी उसकी क़सम खाई बहुत है

न मैं ज़ाहिर करूँगा औरों पर यह
मगर सच है वो हरज़ाई बहुत है

एक क़त्आ-

नहीं इल्ज़ाम है उसपे ये ग़ाफ़िल
के उसके चलते रुस्वाई बहुत है
दिले नादान के लुटने पे मेरे
वही बस एक मुस्काई बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 26, 2018

हादिसे किस क़दर लुभाते हैं

नाज़ अँधेरों के भी उठाते हैं
दीये गोया हमीं जलाते हैं

हैं फ़क़त ख़्वाब ही नहीं वे ख़्वाब
जागे जागे जो देखे जाते हैं

हो न हो ख़ुद को देखने की ताब
आईना लोग पर दिखाते हैं

जो न आते हों सोच उनके लिए
तेरे दिल तक हम आते जाते हैं

कोई ग़ाफ़िल से आके पूछ तो ले
हादिसे किस क़दर लुभाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 25, 2018

तुझे इश्क़ भी जानेजाना सिखा दूँ

तू आ मैं ग़ज़ल गुनगुनाना सिखा दूँ
अकेले में ही मुस्कुराना सिखा दूँ

है तुझमें कशिश बाँकपन है चमिश है
तुझे इश्क़ भी जानेजाना सिखा दूँ

ये माना हैं दिलकश अदाएँ तेरी बस
उन्हें मैं ज़रा सा लजाना सिखा दूँ

गो कोशिश निभाने की तेरी है फिर भी
सलीके से उल्फ़त निभाना सिखा दूँ

मिले कोई ग़ाफ़िल जो मुझसा तो उस पर
लगाते हैं कैसे निशाना, सीखा दूँ

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 22, 2018

ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

मुझे तू भूल जाता है मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं रहता हूँ तेरे दिल में तुझे यह क्या नहीं लगता?

निग़ाहे लुत्फ़ तेरा है उधर रुख़ है इधर ऐसे
मुहब्‍बत आज़माना क्‍या तमाशा सा नहीं लगता?

मैं वापस आ ही जाता हूँ वहीं चलता जहाँ से हूँ
ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

तू होता है जो ग़मगीं रू मेरा भी ज़र्द होता है
फिर अपने बीच तुझको क्यूँ कोई रिश्ता नहीं लगता

घुला हो ज़ह्र कितना भी तेरी शोख़े बयानी में
मैं पी जाता हूँ हँस हँस कर मुझे तीखा नहीं लगता

रक़ीबों पर क़रम तेरा न मेरी जाँ पे आ जाए
तू मेरा है मगर अक़्सर मुझे मेरा नहीं लगता

तेरे आते ही ग़ाफ़िल बज़्म में आ जाती है रौनक़
बताना सच के तुझको क्या कभी ऐसा नहीं लगता?

-‘ग़ाफ़िाल’

यहां क्लिक करें और पढ़ें यह ग़ज़ल अमर उजाला दैनिक पर

शनिवार, मार्च 17, 2018

ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

रुख़ पे उल्फ़त के जो जेवर नहीं देखे जाते
आईने ऐसे भी शब भर नहीं देखे जाते

देखा जाता है महज़ उड़ता है कितना कोई
उड़ने वालों के कभी पर नहीं देखे जाते

ये ही क्‍या कम है के हो जाते हैं जी को महसूस
आप इस तर्फ़ तो अक़्सर नहीं देखे जाते

हो तबस्सुम जो लबों पर तो बने बात भी कुछ
ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

आओ क्यूँ हम भी न इस जश्न में शामिल हो लें
खेल अब इश्क़ के छुपकर नहीं देखे जाते

आएगी वस्ल की शब अपनी भी क्या ग़ाफ़िल जी
आप तो अपने से बाहर नहीं देखे जाते

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 15, 2018

जब मिला तू जामे से बाहर मिला

तूने चाहा था जो वो जी भर मिला
तू ही कह क्या तू भी मुझको पर मिला

आज तक फुटपाथ पर था जी को अब
तू दिखा लगता है सुन्दर घर मिला

रब्त क़ायम हो न पाया गो के तू
आते जाते राह में अक़्सर मिला

शह्रे जाना में गया मैं जब कभी
हर बशर क्यूँ मुझको दीदःवर मिला

कैसे कह पाता मैं ग़ाफ़िल हाले दिल
जब मिला तू जामे से बाहर मिला

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 12, 2018

मैं अपने ज़िस्म के कच्चे मक़ान से भी गया

रहा जो थोड़ा अब उस आन बान से भी गया
मैं तेरे इश्क़ में धरमो ईमान से भी गया

मक़ाम ख़ुल्द था पर हाय री मेरी किस्मत
मैं अपने ज़िस्म के कच्चे मक़ान से भी गया

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, फ़रवरी 26, 2018

तू आई तो साँस आखि़री बनके आई

लगे है के तू ज़िन्दगी बनके आई
पै पुड़िया कोई ज़ह्र की बनके आई

बग़ावत पे जाँ भी थी दौराने हिज़्राँ
न तू राबिता आपसी बनके आई

तुझे कब मिली ग़ैर से बोल फ़ुर्सत
मेरी भी ख़ुशी क्या कभी बनके आई

तू मुझको है प्यारी मेरी जान से भी
तू ही दुश्मने जाँ मेरी बनके आई

मैं चाहूँगा बेशक़ के इक बार डूबूँ
है तू जो उफ़नती नदी बनके आई

थी साँसों में रफ़्तारगी थी न तू जब
तू आई तो साँस आखि़री बनके आई

तलब तेरे होंटों के मय की थी ग़ाफ़िल
मगर जाम तू शर्बती बनके आई

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 14, 2018

मिल जाए इश्क़ हुस्न का सौदा किए बग़ैर

एक तो डॉ. मिर्ज़ा हादी ‘रुस्वा’ की इस ज़मीन पर कहना कठिन... परसो रात से ही यह ग़ज़ल अटकी पड़ी थी बमुश्किल आज निपटी-

वह रात हाए! आरज़ू उसका किए बग़ैर
आता है कोई ख़्वाब में वादा किए बग़ैर

मुझको पता है दिल में मेरे अब जो आ गए
जाओगे यूँ न आप तमाशा किए बग़ैर

हिक़्मत कोई भी कर लो मगर बात है ये तै
अच्छा न कुछ भी पाओगे अच्छा किए बग़ैर

जलता जिगर है डूबके दर्या-ए-इश्क़ में
सहता है नाज़ हुस्न का चर्चा किए बग़ैर

मुश्ताक़ इस क़दर हूँ के जाने ग़ज़ल तेरा
आती कहाँ है नींद नज़ारा किए बग़ैर

नख़रे तमाम और भी तीरे नज़र का वार
क्या क्या सितम सहा हूँ मैं शिक़्वा किए बग़ैर

क्या इस सिफ़त का ठौर है ग़ाफ़िल कहीं जहाँ
मिल जाए इश्क़ हुस्न का सौदा किए बग़ैर

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, फ़रवरी 12, 2018

या चले तो तीर सीनःपार होना चाहिए

आपको मुझसे भी थोड़ा प्यार होना चाहिए
और है तो प्यार का इज़्हार होना चाहिए

या चलाया ही न जाए तीर सीने पर कभी
या चले तो तीर सीनःपार होना चाहिए

फ़ासिले पनपे हैं अक़्सर वस्ल के साए में ही
हिज़्र का एहसास भी इक बार होना चाहिए

हो नहीं गर जिस्म में चल जाएगा फिर भी जनाब
आपकी बातों में लेकिन भार होना चाहिए

वह ख़बर जिससे सुक़ून आए उसे भी छापता
ऐसे पाए का भी तो अख़बार होना चाहिए

कब तलक ग़ैरों के बाग़ों से चलेगा अपना काम
क्या चमन अपना नहीं गुलज़ार होना चाहिए

राय यह कायम हुई ख़ुद के लिए ग़ाफ़िल जी आज
यार हो मक्कार तो मक्कार होना चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 31, 2018

एक शे’र आज के चाँद के नाम-

रुख़ ढकने का लाख जतन पर नक़ाब सरका जाता है
ग़ाफ़िल तो लट्टू हो बैठा चाँद की पर्दादारी पर

-‘ग़ाफ़िल’

हमारी दो ग़ज़ल अमर उजाला दैनिक के पोटल पर, हेडिंग पर क्लिक करें और आप सब ज़ुरूर लुत्फ़ लें-

मंगलवार, जनवरी 30, 2018

ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

भले ही बेलने को रोटियाँ बेलन उठाते हैं
लगे पर ठोंकने मुझको अभी बालम जी आते हैं

सितारों से मेरा दामन सजाने की अहद कर वो
मेरे सीने पे तोपो बम व बन्दूकें चलाते हैं

बलम जी आ तो जाते हैं मेरे सपने में अक़्सर पर
कभी ख़ुद बनके आते हैं कभी मुझको बनाते हैं

नहीं गाली इसे मानो ये है इज़्हारे उल्फ़त ही
जो मैं उनको सुनाता हूँ जो वो मुझको सुनाते हैं

घटाओं सी मेरी ज़ुल्फ़ों को झोंटे का लक़ब देकर
उसी बाबत बलम जी बारहा कुछ बुदबुदाते हैं

मुसन्निफ़ हैं अदा से बह्र में कुछ भी हो कर देंगे
ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 27, 2018

देखना ग़ाफ़िल अकेला देवता रह जाएगा

एक दिन जाती ये ज़ीनत देखता रह जाएगा
बस ग़ुरूरे ख़ाम ही इस हुस्न का रह जाएगा

माग लेगी ज़िन्दगी तेरी ही गर तुझसे कभी
आदमीयत की सनद फिर क्या भला रह जाएगा

जाने क्यूँ आने लगा अब जी में अपने यह ख़याल
तू चला जाएगा दिल से गर तो क्या रह जाएगा

गर तसव्वुर में न आएगा तू आगे भी कभी
वक़्त गुज़रेगा मगर वादा वफ़ा रह जाएगा

यूँ ही गर होता रहा इंसाफ़ में लेटो लतीफ़
मुद्दई ख़प जाएँगे और मुद्दआ रह जाएगा

कर ही दे! बाकी रहा करना अगर इज़्हारे इश्क़
हो न हो कुछ और लेकिन दिल ख़फ़ा रह जाएगा

इस तरह के मज़्हबी उन्माद के ज़ेरे असर
देखना ग़ाफ़िल अकेला देवता रह जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

कोई शर्माए तो शर्माए क्यूँ

तू नहीं याद तेरी आए क्यूँ
बोल मुझ पर ये सितम हाए! क्यूँ

जी ही जब आए नहीं आपे में
ज़िन्दगी कोई ग़ज़ल गाए क्यूँ

तेरे दर पर भी पहुँच कर साक़ी
आदमी जाम न टकराए क्यूँ

पूछे किस तौर कोई तुझसे अब
यह के कमज़र्फ तुझे भाए क्यूँ

जंगो उल्फ़त में भला ग़ाफ़िल जी
कोई शर्माए तो शर्माए क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 22, 2018

ता’उम्र हमें जीना सरकार ज़ुरूरी है

माना के मुहब्बत में तक़रार ज़ुरूरी है
पर हार मेरी ही क्यूँ हर बार ज़ुरूरी है

हो इश्क़ भले कितना उल्फ़त में मगर फिर भी
आँखों से ही हो चाहे इज़्हार ज़ुरूरी है

मरना है मुअय्यन पर मरने के लिए भी तो
ता’उम्र हमें जीना सरकार ज़ुरूरी है

तुमको हो पता क्यूँकर है चीज़ मुहब्बत जो
हम सबके लिए कितना ऐ यार ज़ुरूरी है

हमको भी ज़रा कोई समझा तो दे आख़िर क्यूँ
अश्आरों में नफ़्रत का व्यापार ज़ुरूरी है

दौलत भी और अज़्मत भी क्या क्या न दिया रब ने
क्या उसका नहीं बोलो आभार ज़ुरूरी है

जी तो हैं रहे सारे पर शौकतो इश्रत से
जीने के लिए ग़ाफ़िल घर बार ज़ुरूरी है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 20, 2018

ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

मेरे ज़ेह्नो जिगर पर छा रहा है
तू रफ़्ता रफ़्ता दिल में आ रहा है

पता है तू कहेगा हुस्न तेरा
ख़यालों का हसीं गुञ्चा रहा है

छुपाए फिर रहा सीना तू लेकिन
यही बोलेगा इसमें क्या रहा है

तू मेरा है मुझे है फ़ख़्र तुझ पर
भले ही ख़ार के जैसा रहा है

अभी पहुँचा ही तू ग़ाफ़िल यहाँ और
ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

आगे ख़्वाबों के क्या नज़ारे थे

एक से एक ख़ूब सारे थे
दिल हमारा था और आरे थे

बात इतने पे आके ठहरी है
तुम हमारे के हम तुम्हारे थे

ख़ूब उफ़नते फड़कते सागर में
बेड़े हम भी कभी उतारे थे

हमको देखे भी पर न आया ख़याल
यह के हम उनको जी से प्यारे थे

क्यूँ न किस्मत सँवार पाए तेरी
जबके हम टूटे हुए तारे थे

बनके शोला भड़क उठे हैं सभी
जी में जो इश्क़ के शरारे थे

क्या क्या औ तौर किस कहें ग़ाफ़िल
आगे ख़्वाबों के क्या नज़ारे थे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जनवरी 18, 2018

है रास्ता बुरा या चला देर से

हुई तो रज़ा पर ज़रा देर से
है बात इसपे ठहरी के आ देर से

सँभालूँगा कैसे बताओ कोई
मज़ा प्यार का गर मिला देर से

इशारे के बाबत मुझे अब लगा
किया तो उसे पर किया देर से

वो दिल तक मेरे क्यूँ न पहुँचा अभी
है रस्ता बुरा या चला देर से

सहर से ही ग़ाफ़िल दरे बज़्म है
हुई शाम की इब्तिदा देर से

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 17, 2018

स्वर्ग बदे बाहन सरकारी किया करौ

पीठ मा आरी बातैं प्यारी किया करौ
अइसौ अपनी जीभ दुधारी किया करौ

बहुत चाक-चौबन्द हौ माना हम फिर भी
हमहू से कुछ रायशुमारी किया करौ

नहीं अउर तौ दतुइन ही गायब कइ दो
जियै मा यतनी तौ दुश्वारी किया करौ

पार नहीं पइबो सरकारी डकुवन से
जिनगी भर तू कोर्ट हज़ारी किया करौ

बच्च्यन कै अय्याशी ख़ूब फले फूले
बन्यो है बाबू ज़ेबैं भारी किया करौ

प्राइबेट से जाबो जिम्मा के लेई
स्वर्ग बदे बाहन सरकारी किया करौ

दानिशमंद रह्यो छाँटे अब झेलौ तू
कहे रहेन ग़ाफ़िल से यारी किया करौ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जनवरी 16, 2018

मज़े का नाच-गाना चल रहा है

नहीं गो पाई आना चल रहा है
बहुत कुछ पर पुराना चल रहा है

न मिल पाने का तेरा आज भी तो
वही जो था बहाना चल रहा है

कभी था आज़माया मैं किसी पर
अभी तक वह निशाना चल रहा है

रहे उल्फ़त जो ठुकराई थी तूने
उसी रह पर दीवाना चल रहा है

फ़लक़ का जो कभी ताना था मैंने
अभी वह शामियाना चल रहा है

वफ़ा की लाश पर पहले ही जैसा
मज़े का नाच-गाना चल रहा है

भरम ही है तेरा ग़ाफ़िल के तेरे
इशारे पर ज़माना चल रहा है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जनवरी 14, 2018

है क़शिश कुछ तो इस चश्मे तर में

तीरगी जब है जेह्नो जिगर में
रौशनी बोलो कैसे हो घर  में

कैसी डाली नज़र तूने यारा
अब नहीं फूल आते शजर में

फिर भुला पाएगा ख़ाक मुझको
तू बसा पहले दिल के नगर में

डूबता जा रहा हूँ सरापा
है क़शिश कुछ तो इस चश्मे तर में

इश्रतें वस्ले शब् की डुबोया
जी का तूफ़ान फिर दोपहर में

फूटता इश्क़ का ठीकरा है
क्यूँ मेरे सर ही अक़्सर शहर में

कब तलक यूँ रहूँगा मैं ग़ाफ़िल
आ ही जाऊँगा इक दिन बहर में

-‘ग़ाफ़िल’

चाहता हूँ मैं तुझे पर देख लूँ

तू कहे तो छिप-छिपाकर देख लूँ
चाहता हूँ मैं तुझे पर देख लूँ

तू भी तड़पे वस्ल को मेरे कभी
क्या हो अच्छा मैं वो मंज़र देख लूँ

मौत आ जाने से पहले क्यूँ नहीं
मैं हुनर तेरा सितमगर देख लूँ

राहे उल्फ़त में, नहीं भटकूँ सो मैं
क्यूँ न नक़्शे-पा-ए-रहबर देख लूँ

रह गई ख़्वाहिश के तुझको इक दफा
यार ग़ाफ़िल आज़माकर देख लूँ

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 12, 2018

तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

शाद हूँ गोया अभी तक है नफ़ासत बाक़ी
और तो और ज़माने में है इज़्ज़त बाक़ी

आप मानोगे नहीं पर है यही सच यारो
मैं हूँ ज़िन्दा के अभी भी है जो ग़फ़लत बाक़ी

खुल के रो भी न सकूँ आह भी अब साथ कहाँ
कैसे झेलूँगा है जो थोड़ी सी किस्मत बाक़ी

आख़िरी साँस थी मैं था थे सभी रिश्तेदार
तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

एक दिन दाँतों से मिल जाएगा ग़ाफ़िल जो जवाब
दोहरे की ये रहेगी क्या तेरी लत बाकी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 08, 2018

दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

जी में रहे के होंटों पे, चाहे जहाँ रहे
करिए दुआ हज़ार ये उल्फ़त जवाँ रहे

हर सू भले अँधेरा हो चल जाएगा मगर
हर इक नज़र में प्यार का सूरज अयाँ रहे

बर्दाश्त हो भी जाएगा नुक़्सान बाग़ का
पर यह सितम न हो के नहीं बाग़बाँ रहे

यह भी सवाल ग़ौरतलब है के जिस गली
रहता न हो मक़ीन भला क्या मक़ाँ रहे

हो या न हो ये बात अलहदा है यार पर
तुझको है मुझसे इश्क़ ये मुझको गुमाँ रहे

हम आशिक़ों को शौक से कहिए बुरा भला
पर चाहिए के हुस्न भी थोड़ा निहाँ रहे

ग़ाफ़िल है यह सही है पर आशिक़ भी है तेरा
दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 05, 2018

क्या कहूँ ग़ाफ़िल जी क्या क्या मोहतरम करते रहे

क्यूँ तसव्वुर से हमारे रब्त कम करते रहे
आप कुछ इस तर्ह भी हम पर सितम करते रहे

सोचिए क्या आपसे हो भी सका वादा वफ़ा
देखिए तो यह ज़ुरूरी काम हम करते रहे

राख हम तो हो गए उल्फ़त की आतिश में फिर आप
किसको दिखलाने के बाबत चश्म नम करते रहे

अनसुनी होती रही क्यूँ फिर सदा गुंचे की और
जुल्म पंखुड़ियों पर उसके बेरहम करते रहे

उस तरह वह सब कोई भी शख़्स कर सकता नहीं
जिस तरह जो जो गुनाह अपने बलम करते रहे

जब नहीं करना था कुछ और इक मुहब्बत के सिवा
क्या कहूँ ग़ाफ़िल जी क्या क्या मोहतरम करते रहे

-‘ग़ाफ़िल’