Showing posts with label क़त्आ. Show all posts
Showing posts with label क़त्आ. Show all posts

Wednesday, September 28, 2022

फिर से बस एक बार मेरे जी में आके देख

दौरे रवाँ में वैसे तो मुश्किल बहुत है यार
आएगा लुत्फ़ फिर भी ज़रा मुस्कुराके देख
माना के तेरी आज-कल आमद नहीं रही
फिर से बस एक बार मेरे जी में आके देख

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, September 20, 2022

आईना भी जो मैं हूँ दिखाता नहीं

था कभी गुलसिताँ दिल बियाबाँ है अब
कोई आता नहीं कोई जाता नहीं
क्या अजीब आजकल अपनी तक़दीर है
आईना भी जो मैं हूँ दिखाता नहीं

-‘ग़ाफ़िल’


Wednesday, June 22, 2022

ख़्वाब बाकी है

क्या कहें क्या जनाब बाकी है
नींद टूटी है ख़्वाब बाकी है
वैसे हम नींद में नहीं चलते
रात का पर हिसाब बाकी है

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, August 22, 2021

सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा

अभी तक हो नहीं पाया है गोया ऐसा जादूगर
के दुनिया में है जैसा जो उसे वैसा दिखा देगा
मगर फिर भी, मेरे महबूब का नाम आप मत पूछो
सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, January 11, 2021

नयी सी ताल पे नचती वही जवानी है

 जाड़ा (11 जनवरी 2021, 10.2AM)
कोई भी साल हो मौसम तो रंग बदलेगा
हर एक उम्र की यारो यही कहानी है
नया सा सुर है मगर गीत है वही अपना
नयी सी ताल पे नचती वही जवानी है
-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 09, 2020

हम हैं फिर प्यार का मुहूरत है


मेरी जानिब से आप सबको दो क़त्आत नज़्र किये जाते हैं मुलाहिज़ा फ़र्माएँ!

1.
है मुसन्निफ़ की कोई जाने ग़ज़ल
या मुसब्बिर की कोई मूरत है
ख़ूबसूरत फ़क़त न कहिए इसे
हुस्न तो इश्क़ की ज़ुरूरत है

2.
देखिए! ग़ौर कीजिए इसपर
बाद अर्से के ऐसी सूरत है
क्या नमूज़ी बताएगा इसको
हम हैं फिर प्यार का महूरत है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 02, 2020

मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

ज़ुनून आने का क्यूँ न जाना हो गर
और आए भी क्या जो हम आकर चले
चलो ख़ैर आए हम अक़्सर यहाँ
मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, September 23, 2020

ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में

न यह पूछो के लग जाती है क्यूँकर आग पानी में
ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में
मुझे होना ही गर था इश्क़ तो उससे हुआ क्यूँ जो
मचलती रहती थी हर सिम्त नानी की कहानी में

-‘ग़ाफ़िल’

(चित्र गूगल से साभार)

Monday, August 31, 2020

वो ख़ुद नहीं हैं आए है आया सलाम पर

ये भी तो कम नहीं है मुहब्बत के नाम पर
वो ख़ुद नहीं हैं आए है आया सलाम पर
जारी रहेगा ऐसे भी उल्फ़त का कारोबार
होता रहे जो होगा असर ख़ासोआम पर

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 28, 2020

अर्से के बाद आए वो देखो तो क्या लिए

कुछ लानतें मलामतें शिक़्वा गिला लिए
अर्से के बाद आए वो देखो तो क्या लिए
फ़िलहाल इश्क़ वाली हरारत रहे बनी
कम तो न था सबब ये, जो हम जी जला लिए

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 10, 2020

कोई अपना ही दूसरा समझे

😔

तू ही जो मुझको ग़ैर समझा है फिर
क्यूँ न दुनिया मुझे तेरा समझे
जीना चाहे भी कोई क्यूँ जब उसे
कोई अपना ही दूसरा समझे

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, April 18, 2020

कभी जीतकर कभी हारकर

न था इल्म यह के गुनाह कर दिया मैंने यूँ तुझे प्यार कर
मेरे यार तुझसे है इल्तिज़ा न करे मुआफ़ तो दार कर
जो कहे तू है ये गुनाह तो ये गुनाह मेरा शग़ल रहा
मुझे जो जँचा उसे पा लिया कभी जीतकर कभी हारकर

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 13, 2020

वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

उसका हो क्या के उनके बिन महरूम
आजतक हम जो दस्तो पा से रहे
उनको रहना न वैसे रास आया
वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Monday, February 03, 2020

मेरी रात आज भी कँवारी है

ये जो उल्फ़त है तेरी मेरे लिए
बस ज़रा सी है या के सारी है?
इश्क़बाजी के फेर में ग़ाफ़िल!!
मेरी रात आज भी कँवारी है

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Saturday, January 25, 2020

ग़म थे जो रक़म हुए

आदाब दोस्तो!

क्या करें भी याद कर यह के दौरे इश्क़ में
हमपे क्या सितम हुए और क्या क़रम हुए
बस उसी ही नाज़ से आज भी रहे सता
हिज्र वाली रात में ग़म थे जो रक़म हुए

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, November 19, 2019

ये ज़िन्दगी

नाच गर आए न तो आँगन को टेढ़ा क्यूँ कहें
क्यूँ कहें तलवार की सी धार है ये ज़िन्दगी
देखिए तो ज़िन्दगी बस चार दिन का खेल है
सोचिए तो जिस्म के भी पार है ये ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, November 16, 2019

जिसे आँख भर देखते हो

जिगर देखते हो यक़ीनन
मेरे सिम्त अगर देखते हो
ज़रा ग़ुफ़्तगू भी हो उससे
जिसे आँख भर देखते हो

-‘ग़ाफ़िल’