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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, June 29, 2017

हिन्‍द वालों से न पूछो मेज़बानी की वजह

जान ही जाएँगे आप इक दिन कहानी की वजह
है क़शिश कोई तो दर्या के रवानी की वजह

मौत पर अपनी भला क्यूँ उसका मानें इख़्तियार
शै नहीं है जो हमारी ज़िन्दगानी की वजह

हर कोई मिह्मान रखता है ख़ुदा का मर्तबा
हिन्‍द वालों से न पूछो मेज़बानी की वजह

कैसे बन सकता है कोई एक अहले मुल्क़ के
भूखे नंगों बेकसों के दाना पानी की वजह

हूँ मुसन्निफ़ तो क़सीदाकार पर हरगिज़ नहीं
फिर कहो क्या है तुम्हारी मिह्रबानी की वजह

होके ग़ाफ़िल देख लेना यह क़रिश्माई फ़ितूर
कोई ऊला किस तरह बनता है सानी की वजह

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 27, 2017

ज़िन्दगी ख़ुद को समझ बैठी है तन्हा कितना

आदमी कितना हैं हम और खिलौना कितना
सोचना चाहिए गो फिर भी यूँ सोचा कितना

क्या हुआ ख़ामियों का लोग उड़ाते हैं मज़ाक
ख़ूबियों का ही यहाँ होता है सुह्रा कितना

बेतरह दिल पे है क़ाबिज़ जो कहीं से आकर
सोचता हूँ के है उस शख़्स का हिस्सा कितना

उठ रहा मेरा जनाज़ा था जब इस दुनिया से
हाय! क़ातिल भी मेरा अश्क बहाया कितना!!

कोई बूढ़ा न हुआ कोई जवाँ भी तो नहीं
आख़िर इस शह्र का अब होगा तमाशा कितना?

ठीक है तेरी ये महफ़िल हो मुबारक तुझको
वैसे भी मेरा इधर होता है आना कितना

वस्ल के शब् की क़शिश साथ है ग़ाफ़िल फिर भी
ज़िन्दगी ख़ुद को समझ बैठी है तन्हा कितना

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, June 25, 2017

जनाज़े पर किसी के जाके मुस्काया नहीं करते

ज़रर हर मर्तबा वालों को बतलाया नहीं करते
फ़लक़ छू लें भले ही ताड़ पर छाया नहीं करते

बताओ डालोगे काँटा भला कितनी मछलियों पर
किसी के जी से यूँ खिलवाड़ ऐ भाया नहीं करते

सुना दो लंतरानी ही के जाए जी बहल अपना
कभी मासूम को मायूस कर जाया नहीं करते

अगर ग़मख़्वार हो तो आओ सच में ग़मग़लत कर दो
अरे ग़मग़ीन को ख़्वाबों में उलझाया नहीं करते

मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार मुझको मत समझ लेना
निगाहे बद कभी इंसाँ पे दौड़ाया नहीं करते

हमेशा मुस्कुराते हैं जो कोई उनको समझाओ
जनाज़े पर किसी के जाके मुस्काया नहीं करते

ज़ुरूरत हो नहीं तब भी मुख़ालिफ़ दौड़ आते हैं
ज़ुरूरत पर भी ग़ाफ़िल दोस्त कुछ आया नहीं करते

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, June 23, 2017

मगर उल्फ़त के अफ़साने रहेंगे

आदाब दोस्तो! यह दो शे’र आप सबके हवाले-

सफ़र की राह ही यूँ है के साथ अब
रहेंगे गर तो वीराने रहेंगे
भले ही दुनिया से उठ जाएँ उश्शाक़
मगर उल्फ़त के अफ़साने रहेंगे

-‘ग़ाफ़िल’


Thursday, June 22, 2017

क्यूँ उधर जाऊँ

आदाब अर्ज़ है!

हुस्न भी गो प्यार की है बात करता
पर लगे है बात उसकी दोगली है
और पत्थर सह नहीं पाऊँगा तो फिर
क्यूँ उधर जाऊँ जिधर उसकी गली है

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, June 15, 2017

तू नज़र भर देख तो ले क्या से क्या हो जाऊँगा

बेवफ़ा मैं आज हूँ कल बावफ़ा हो जाऊँगा
तू नज़र भर देख तो ले क्या से क्या हो जाऊँगा

आ तो मेरे सामने तू सज सँवर कर एक दिन
है सिफ़त मुझमें तेरा मैं आईना हो जाऊँगा

यूँ ही आगे भी सताया तू नहीं मुझको अगर
तुझसे फिर मैं ज़िन्दगी भर को ख़फ़ा हो जाऊँगा

है तुझे क्या इल्म भी रस्मे वफ़ा क्या चीज़ है
खेलना चाहेगा मुझको खेल सा हो जाऊँगा

तू हुआ ग़ाफ़िल अगर मेरी मुहब्बत से कभी
बस उसी ही पल यक़ीनन मैं हवा हो जाऊँगा

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 14, 2017

अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

मेरे भी सामने खुलकर कभी आया जाए
आतिशे हुस्न से मुझको भी जलाया जाए

इश्क़बाज़ों को बुरे अच्छे का हो इल्म ही क्यूँ
हमपे अब और न इल्ज़ाम लगाया जाए

खा क़सम कर ही दिया प्यार की इक रस्म अदा
तू बता और है क्या यूँ भी जो खाया जाए

है किसे होश यहाँ पी के नज़र वाली शराब
अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

जो भी ग़ुमराह किया करते हैं वो हैं अपने
यह सबक याद है कुछ और बताया जाए

रहबरी कर तो मैं सकता हूँ अपाहिज़ की भी
शर्त यह है के उसे राह पे लाया जाए

चैन जी को है मिले उसके ही दर ग़ाफ़िल जी
किस बहाने से मगर सोचिए जाया जाए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, June 12, 2017

हम्‍माम

हम्‍माम में तो वैसे भी नंगे हैं सभी लोग
हम्‍माम भी कुछ यूँ है न छत है न है दीवार

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, June 10, 2017

लोग ज्यूँ बैंडबाज़े हुए

आप माना के मेरे हुए
पर हुआ अर्सा देखे हुए

मैं बताऊँ भी तो किस तरह
हादिसे कैसे कैसे हुए

ग़ैरमुम्क़िन है पाना सुक़ूँ
लोग ज्यूँ बैंडबाज़े हुए

मेरा गिरने का ग़म भी गया
आपको देख हँसते हुए

कम नहीं झेलना आपका
शे’र ग़ाफ़िल के जितने हुए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, June 05, 2017

चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

जो रुस्वाइयों की हसीं सी डगर है
भला क्यूँ जी उस पर ही ज़ेरे सफ़र है

तेरी याद में आ तो जाऊँ मैं लेकिन
तू फिर भूल जाएगा मुझको ये डर है

हूँ मैं ही तराशा ख़ुदा जो बना तू
अरे संग इसकी तुझे क्या ख़बर है

सबक इश्क़ का बेश्तर याद करना
लगे गोया इसमें ही सारी उमर है

हूँ क़ाइल शबे वस्ल का इसलिए मैं
के यह चुलबुली है भले मुख़्तसर है

ज़माना कहे तो कहे तुझको ग़ाफ़िल
चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, June 01, 2017

जी ही तब मेरा जलाने आए

आए तू कोई बहाने आए
पास मेरे भी ज़माने आए
जब कभी सूझे नहीं हाथ को हाथ
जी ही तब मेरा जलाने आए

-‘ग़ाफ़िल’