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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, July 31, 2018

ग़ाफ़िल इन हुस्नफ़रोशों का मगर क्या होगा

ग़ैरों से तेरे तअल्लुक़ का असर क्या होगा
होगा जो होगा मेरी जान को पर क्या होगा

चारागर रोक भी पाएगा निकलती जाँ तू
लाख है लेकिन अभी तेरा हुनर क्या होगा

एक पौधे पे रहे छाँव अगर पीपल की
सोचना ये है के वह तिफ़्ल शजर क्या होगा

तू ही गो शह्र में क़ातिल है मेरी जान मगर
क़त्ल करने को मेरा तेरा जिगर क्या होगा

फिर भी जी लेंगे हम उश्शाक़ दीवानेपन में
ग़ाफ़िल इन हुस्नफ़रोशों का मगर क्या होगा

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 30, 2018

तुझे ऐ ख़ुदा सोचना चाहता हूँ

आदाब दोस्तो! पेशे ख़िदमत है आज की ही हुई एक ऐसी ग़ज़ल जो होते होते अचानक इबादत हो गई-

तुझे क्या बताऊँ के क्या चाहता हूँ
हमेशा को तेरा हुआ चाहता हूँ

न सह पा रहा हूँ तेरा अब तग़ाफ़ुल
वही फिर मैं शिक़्वा गिला चाहता हूँ

वफ़ाई ज़फ़ाई परे कर दिया पर
तेरा लुत्फ़ ख़ुद में ज़रा चाहता हूँ

जहाँ है मुझे बस तसव्वुर में ले ले
कहाँ अब तेरा मैं पता चाहता हूँ

हूँ जाहिल नहीं गो मगर फिर भी तेरे
गये रास्ते पर चला चाहता हूँ

फ़ना तो है होना मगर उसके पहले
तुझे ऐ ख़ुदा सोचना चाहता हूँ

भले ही कहें लोग ग़ाफ़िल मुझे पर
ग़ज़ल आज तुझ पर कहा चाहता हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, July 29, 2018

गिर रहा है जो सँभाले से सँभल जाएगा

जो गया और कहीं और फिसल जाएगा
ये मेरा दिल है तेरे पास भी पल जाएगा

क्यूँ मनाने की मैं तद्बीर ही कुछ और करूँ
इक तबस्सुम पे तू वैसे भी पिघल जाएगा

चाँद के रू से तो हटने दे इन अब्रों का नक़ाब
वह भी अरमान जो बाकी है निकल जाएगा

गिर चुका है जो उसे रब ही उठाए आकर
गिर रहा है जो सँभाले से सँभल जाएगा

तंज़ कर ले ऐ ज़माने तू अभी मौका है
आज भर को ही है ग़ाफ़िल भी ये कल जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, July 26, 2018

ग़मगीं हैं क्यूँ जनाब ज़रा सब्र कीजिए

यूँ देखिए न ख़्वाब ज़रा सब्र कीजिए
उतरे तो यह नक़ाब ज़रा सब्र कीजिए

पीकर शराबे हुस्न मियाँ ज़िन्दगी हसीं
मत कीजिए ख़राब ज़रा सब्र कीजिए

क़ायम जो कर रहे हैं सुबो सुब येे राय, क्या
साेेंणा है आफ़्ताब ज़रा सब्र कीजिए

चलना ही जब है ख़ार पर इन आबलों के पा
ग़मगीं हैं क्यूँ जनाब ज़रा सब्र कीजिए

ढल जाएगा ये रोज़ गो आएगी रात पर
निकलेगा माहताब ज़रा सब्र कीजिए

जो दूध है वो दूध है कैसे उसे भला
कह पाऊँगा मैं आब ज़रा सब्र कीजिए

ग़ाफ़िल जी ये ग़ुमान! रहेंगी न इश्रतें
टूटेगा जब अज़ाब ज़रा सब्र कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, July 25, 2018

ग़ाफ़िल अब जान भी गँवाओगे

इस ग़ज़ल पर नज़र फिराओगे
नाचोगे झूम झूम गाओगे

है कमाल अपनी अपनी चाहत का
जैसे चाहोगे मुझको पाओगे

भूल पाए नहीं हो वस्ल अभी
हिज़्र क्या ख़ाक तुम भुलाओगे

क्या छुपेगा तुम्हारा इश्क़ मगर
तुम तो बस तुम हो तुम छुपाओगे

मेरे क़ातिल मेरे जनाज़े में
मुझको मालूम है तुम आओगे

कोई भी पा नहीं सका अब तक
चाँद क्या तुम मुझे दिलाओगे

हुस्न वालों से गुफ़्तगू भी तो यूँ
ग़ाफ़िल अब जान भी गँवाओगे

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 24, 2018

सू-ए-दार पर न जाए

मेरा जी तो यह कहे है चले तीर नज़रों वाला
जिसे होना हो फ़ना हो सू-ए-दार पर न जाए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 23, 2018

दो शे'र-

😽1-

दुश्मनी ही है निभी तुझसे कहाँ
तू यहाँ ढब से निभाया क्या है

😽2-

कर लिया होगा जी याद ऐसे ही
तू कभी उसमें तो आया क्या है

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, July 21, 2018

ग़ाफ़िल को नुक़्सान रहेगा

तू कब तक नादान रहेगा
यह कहना आसान रहेगा

दिल में रहे न रहे हमारे
मन्दिर में भगवान रहेगा

सच ही मरेगा हुक़्मरान के
जब तक केवल कान रहेगा

दौरे तरक़्क़ी होगा न क्या कुछ
लेकिन क्या इंसान रहेगा

मैं न रहूँगा तुम न रहोगे
पर अपना अभिमान रहेगा

बज़्मे अदब में पीने पिलाने
का भी क्या सामान रहेगा

कितना ही कुछ कर ले जमा पर
ग़ाफ़िल को नुक़्सान रहेगा

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, July 19, 2018

ख़ंजरे दस्त अब गया किस्सा हुआ

जी गँवा बैठा है कहता क्या हुआ
किस क़दर है आदमी बहका हुआ

चाँद जब निकला न था तो वो था हाल
और जब निकला तो हो हल्ला हुआ

उसको तो मालूम होना चाहिए
रात भर जिसका यहाँ चर्चा हुआ

ज़ख़्म देना है चला तीरे नज़र
ख़ंजरे दस्त अब गया किस्सा हुआ

हुस्न के लासे में चिपका हर बशर
या हुआ ग़ाफ़िल के दीवाना हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, July 18, 2018

है क़रार आता मुझे ग़ाफ़िल तेरी तक़रार से

मैं फ़क़ीर अलमस्त क्या लेना मुझे संसार से
कोई दुत्कारे पुकारे या के कोई प्यार से

ख़ार भी हैं गुल भी हैं दोनों का है रुत्‍बा मगर
किसको देखा लौ लगाते गुलसिताँ में ख़ार से

बस ज़रा ठहरो मुझे भी ग़ालिबो तुम सबमें आज
देखना है कौन बचता है नज़र के वार से

जल रहा था शह्र मैं पूछा के यह कैसे हुआ
सब कहे भड़की है आतिश तेरे हुस्ने यार से

यूँ तग़ाफ़ुल से सुक़ूनो अम्न जाता है मेरा
है क़रार आता मुझे ग़ाफ़िल तेरी तक़रार से

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 16, 2018

अब लग ही जाए आग या फ़स्ले बहार हो

तौफ़ीक़ में है चाह के यह भी शुमार हो
हो नाज़नीन कोई उसे हमसे प्यार हो

गर है तो फिर सुबूत भी होने का दे ख़ुदा
नाले हों चिल्ल पों हो कुछ आँधी बयार हो

कुछ ख़ास हो नहीं तो सफ़र का है लुत्फ़ क्या
हों फूल गर न राह में गर्दो ग़ुबार हो

फिर क्या करे गिला ही कोई चाहकर भी गर
हो चाँद रात छत पे हो पहलू में यार हो

ग़ाफ़िल सड़ा सड़ा सा ये मौसम न ले ले जान
अब लग ही जाए आग या फ़स्ले बहार हो

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, July 15, 2018

हम निभाते न फ़क़त ढेर सा वादा करते

रोज़ तन्हाई में क्या चाँद निहारा करते
हम जो तुझको न बुलाते तो भला क्या करते

रंज़ो ग़म पीरो अलम गर न सुनाते अपना
हमको लगता है के हम ख़ुद से ही धोखा करते

हमको मालूम तो था तेरी कही का मानी
तेरी सुनते के तेरे दर पे तमाशा करते

एक क़त्आ-

हम न कह पाए के है कौन हमारा क़ातिल
नाम क्या लेके तुझे शह्र में रुस्वा करते
रोज़ ही क़ब्र से जाता तू हमारे होकर
हम तुझे काश के हर रोज़ ही देखा करते

अपनी उल्फ़त की उन्हें भी जो ख़बर हो जाती
इल्म क्या है के ये अह्बाब ही क्या क्या करते

गुंचे खिलते हैं कहाँ वैसे बिखर जाते हैं
करते तो किससे हम इस बात का शिक़्वा करते

चाँद इक रोज़ चुरा लाने को बोले तो थे पर
चाँद सबका है भला कैसे हम ऐसा करते

क्या ये वाज़िब था के नेताओं के जैसे ग़ाफ़िल
हम निभाते न फ़क़त ढेर सा वादा करते

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, July 14, 2018

खाली लिफ़ाफ़ा


मेरे अरमान गोया आजकल शब् भर निकलते हैं

रिझाने सामयीं को जब कभी बाहर निकलते हैं
मेरे अश्आर तब मुझसे भी सज-धज कर निकलते हैं

बड़े ही मनचले आँसू हैं इन पर बस भला किसका
ख़ुशी के पल हों तो आँखों से ये अक़्सर निकलते हैं

यही तो लुत्फ़ है चलता है यूँ ही खेल क़ुद्रत का
निकलते जाँसिताँ हैं कुछ तो कुछ जाँबर निकलते हैं

मुझे तो कम ही लगता है निकलना यह मगर फिर भी
मेरे अरमान गोया आजकल शब् भर निकलते हैं

यही देखा गया है जब भी आती मौत है उनकी
तभी ग़ाफ़िल जी चींटों चींटियों के पर निकलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, July 13, 2018

ग़ाफ़िल हूँ मुझको देखा ओ भाला करे कोई

गर कर सके तो क्यूँ न उजाला करे कोई
लेकिन ये क्या के ख़ुद का रू काला करे कोई

ले ले कहाँ है यार किसी भी लुगत में अब
सो चाहिए के अब तो न ला ला करे कोई

है पालने का शौक ही कुछ भी किसी को गर
मेरे सा रोग प्यार का पाला करे कोई

इक़्रार हो भी जाए मगर एक शर्त है
इज़्हारे इश्क़ चाहने वाला करे कोई

होते हैं पाएदार गो अश्आर मेरे पर
ग़ाफ़िल हूँ मुझको देखा ओ भाला करे कोई

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 10, 2018

चाहता हूँ के तुझे शौक से गा दूँ जो कहे

जाम होंटों का अभी तुझको चखा दूँ जो कहेे
ऐसे उल्फ़त को ज़रा मैं भी हवा दूँ जो कहे

न ख़बर होगी ज़माने को न टूटेगा पहाड़
इस तरह रूहो बदन आज मिला दूँ जो कहे

ये तेरा हक़ है न शरमा तू ज़रा भी ऐ दिल
मैं वो हर चीज़ तेरे वास्ते ला दूँ जो कहे

चाँद तारों पे जो मुद्दत से नज़र है तेरी
चाँद तारों से तेरी मांग सजा दूँ जो कहे

गो हूँ पर तुझसे मैं ग़ाफ़िल हूँ कहाँ जाने ग़ज़ल
चाहता हूँ के तुझे शौक से गा दूँ जो कहे

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 09, 2018

तुम गुलाब हो जाना

📖हर्फ़ हर्फ़ बिखरा हूँ गो के मैं फ़ज़ाओं में
लोग पढ़ सकें मुझको तुम किताब हो जाना📖

🌹साथ इस तरीक़े से और हम निभा लेंगे
ख़ार हूँ मैं गुलशन का तुम गुलाब हो जाना🌹

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, July 06, 2018

अरे वाह!!

🔥राख कर देती है छू भर जाए ग़ाफ़िल जिस्म से
आग की हर इक लपट आँखों को पर भाती है खूब🔥

नमन् साथियो! गणित तो आती नहीं कि गिनकर बताऊँ कितना साल हुआ पर सन् 1988 का आज ही का रोज़ था जब ढोल बाजे के साथ उत्सव मनाते हुए मुझे भी अर्द्धांगिनी के रूप में यह हसीन तोहफ़ा प्राप्त हुआ था

-‘ग़ाफ़िल’