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बुधवार, जनवरी 31, 2018

एक शे’र आज के चाँद के नाम-

रुख़ ढकने का लाख जतन पर नक़ाब सरका जाता है
ग़ाफ़िल तो लट्टू हो बैठा चाँद की पर्दादारी पर

-‘ग़ाफ़िल’

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मंगलवार, जनवरी 30, 2018

ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

भले ही बेलने को रोटियाँ बेलन उठाते हैं
लगे पर ठोंकने मुझको अभी बालम जी आते हैं

सितारों से मेरा दामन सजाने की अहद कर वो
मेरे सीने पे तोपो बम व बन्दूकें चलाते हैं

बलम जी आ तो जाते हैं मेरे सपने में अक़्सर पर
कभी ख़ुद बनके आते हैं कभी मुझको बनाते हैं

नहीं गाली इसे मानो ये है इज़्हारे उल्फ़त ही
जो मैं उनको सुनाता हूँ जो वो मुझको सुनाते हैं

घटाओं सी मेरी ज़ुल्फ़ों को झोंटे का लक़ब देकर
उसी बाबत बलम जी बारहा कुछ बुदबुदाते हैं

मुसन्निफ़ हैं अदा से बह्र में कुछ भी हो कर देंगे
ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 27, 2018

देखना ग़ाफ़िल अकेला देवता रह जाएगा

एक दिन जाती ये ज़ीनत देखता रह जाएगा
बस ग़ुरूरे ख़ाम ही इस हुस्न का रह जाएगा

माग लेगी ज़िन्दगी तेरी ही गर तुझसे कभी
आदमीयत की सनद फिर क्या भला रह जाएगा

जाने क्यूँ आने लगा अब जी में अपने यह ख़याल
तू चला जाएगा दिल से गर तो क्या रह जाएगा

गर तसव्वुर में न आएगा तू आगे भी कभी
वक़्त गुज़रेगा मगर वादा वफ़ा रह जाएगा

यूँ ही गर होता रहा इंसाफ़ में लेटो लतीफ़
मुद्दई ख़प जाएँगे और मुद्दआ रह जाएगा

कर ही दे! बाकी रहा करना अगर इज़्हारे इश्क़
हो न हो कुछ और लेकिन दिल ख़फ़ा रह जाएगा

इस तरह के मज़्हबी उन्माद के ज़ेरे असर
देखना ग़ाफ़िल अकेला देवता रह जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

कोई शर्माए तो शर्माए क्यूँ

तू नहीं याद तेरी आए क्यूँ
बोल मुझ पर ये सितम हाए! क्यूँ

जी ही जब आए नहीं आपे में
ज़िन्दगी कोई ग़ज़ल गाए क्यूँ

तेरे दर पर भी पहुँच कर साक़ी
आदमी जाम न टकराए क्यूँ

पूछे किस तौर कोई तुझसे अब
यह के कमज़र्फ तुझे भाए क्यूँ

जंगो उल्फ़त में भला ग़ाफ़िल जी
कोई शर्माए तो शर्माए क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 22, 2018

ता’उम्र हमें जीना सरकार ज़ुरूरी है

माना के मुहब्बत में तक़रार ज़ुरूरी है
पर हार मेरी ही क्यूँ हर बार ज़ुरूरी है

हो इश्क़ भले कितना उल्फ़त में मगर फिर भी
आँखों से ही हो चाहे इज़्हार ज़ुरूरी है

मरना है मुअय्यन पर मरने के लिए भी तो
ता’उम्र हमें जीना सरकार ज़ुरूरी है

तुमको हो पता क्यूँकर है चीज़ मुहब्बत जो
हम सबके लिए कितना ऐ यार ज़ुरूरी है

हमको भी ज़रा कोई समझा तो दे आख़िर क्यूँ
अश्आरों में नफ़्रत का व्यापार ज़ुरूरी है

दौलत भी और अज़्मत भी क्या क्या न दिया रब ने
क्या उसका नहीं बोलो आभार ज़ुरूरी है

जी तो हैं रहे सारे पर शौकतो इश्रत से
जीने के लिए ग़ाफ़िल घर बार ज़ुरूरी है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 20, 2018

ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

मेरे ज़ेह्नो जिगर पर छा रहा है
तू रफ़्ता रफ़्ता दिल में आ रहा है

पता है तू कहेगा हुस्न तेरा
ख़यालों का हसीं गुञ्चा रहा है

छुपाए फिर रहा सीना तू लेकिन
यही बोलेगा इसमें क्या रहा है

तू मेरा है मुझे है फ़ख़्र तुझ पर
भले ही ख़ार के जैसा रहा है

अभी पहुँचा ही तू ग़ाफ़िल यहाँ और
ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

आगे ख़्वाबों के क्या नज़ारे थे

एक से एक ख़ूब सारे थे
दिल हमारा था और आरे थे

बात इतने पे आके ठहरी है
तुम हमारे के हम तुम्हारे थे

ख़ूब उफ़नते फड़कते सागर में
बेड़े हम भी कभी उतारे थे

हमको देखे भी पर न आया ख़याल
यह के हम उनको जी से प्यारे थे

क्यूँ न किस्मत सँवार पाए तेरी
जबके हम टूटे हुए तारे थे

बनके शोला भड़क उठे हैं सभी
जी में जो इश्क़ के शरारे थे

क्या क्या औ तौर किस कहें ग़ाफ़िल
आगे ख़्वाबों के क्या नज़ारे थे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जनवरी 18, 2018

है रास्ता बुरा या चला देर से

हुई तो रज़ा पर ज़रा देर से
है बात इसपे ठहरी के आ देर से

सँभालूँगा कैसे बताओ कोई
मज़ा प्यार का गर मिला देर से

इशारे के बाबत मुझे अब लगा
किया तो उसे पर किया देर से

वो दिल तक मेरे क्यूँ न पहुँचा अभी
है रस्ता बुरा या चला देर से

सहर से ही ग़ाफ़िल दरे बज़्म है
हुई शाम की इब्तिदा देर से

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 17, 2018

स्वर्ग बदे बाहन सरकारी किया करौ

पीठ मा आरी बातैं प्यारी किया करौ
अइसौ अपनी जीभ दुधारी किया करौ

बहुत चाक-चौबन्द हौ माना हम फिर भी
हमहू से कुछ रायशुमारी किया करौ

नहीं अउर तौ दतुइन ही गायब कइ दो
जियै मा यतनी तौ दुश्वारी किया करौ

पार नहीं पइबो सरकारी डकुवन से
जिनगी भर तू कोर्ट हज़ारी किया करौ

बच्च्यन कै अय्याशी ख़ूब फले फूले
बन्यो है बाबू ज़ेबैं भारी किया करौ

प्राइबेट से जाबो जिम्मा के लेई
स्वर्ग बदे बाहन सरकारी किया करौ

दानिशमंद रह्यो छाँटे अब झेलौ तू
कहे रहेन ग़ाफ़िल से यारी किया करौ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जनवरी 16, 2018

मज़े का नाच-गाना चल रहा है

नहीं गो पाई आना चल रहा है
बहुत कुछ पर पुराना चल रहा है

न मिल पाने का तेरा आज भी तो
वही जो था बहाना चल रहा है

कभी था आज़माया मैं किसी पर
अभी तक वह निशाना चल रहा है

रहे उल्फ़त जो ठुकराई थी तूने
उसी रह पर दीवाना चल रहा है

फ़लक़ का जो कभी ताना था मैंने
अभी वह शामियाना चल रहा है

वफ़ा की लाश पर पहले ही जैसा
मज़े का नाच-गाना चल रहा है

भरम ही है तेरा ग़ाफ़िल के तेरे
इशारे पर ज़माना चल रहा है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जनवरी 14, 2018

है क़शिश कुछ तो इस चश्मे तर में

तीरगी जब है जेह्नो जिगर में
रौशनी बोलो कैसे हो घर  में

कैसी डाली नज़र तूने यारा
अब नहीं फूल आते शजर में

फिर भुला पाएगा ख़ाक मुझको
तू बसा पहले दिल के नगर में

डूबता जा रहा हूँ सरापा
है क़शिश कुछ तो इस चश्मे तर में

इश्रतें वस्ले शब् की डुबोया
जी का तूफ़ान फिर दोपहर में

फूटता इश्क़ का ठीकरा है
क्यूँ मेरे सर ही अक़्सर शहर में

कब तलक यूँ रहूँगा मैं ग़ाफ़िल
आ ही जाऊँगा इक दिन बहर में

-‘ग़ाफ़िल’

चाहता हूँ मैं तुझे पर देख लूँ

तू कहे तो छिप-छिपाकर देख लूँ
चाहता हूँ मैं तुझे पर देख लूँ

तू भी तड़पे वस्ल को मेरे कभी
क्या हो अच्छा मैं वो मंज़र देख लूँ

मौत आ जाने से पहले क्यूँ नहीं
मैं हुनर तेरा सितमगर देख लूँ

राहे उल्फ़त में, नहीं भटकूँ सो मैं
क्यूँ न नक़्शे-पा-ए-रहबर देख लूँ

रह गई ख़्वाहिश के तुझको इक दफा
यार ग़ाफ़िल आज़माकर देख लूँ

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 12, 2018

तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

शाद हूँ गोया अभी तक है नफ़ासत बाक़ी
और तो और ज़माने में है इज़्ज़त बाक़ी

आप मानोगे नहीं पर है यही सच यारो
मैं हूँ ज़िन्दा के अभी भी है जो ग़फ़लत बाक़ी

खुल के रो भी न सकूँ आह भी अब साथ कहाँ
कैसे झेलूँगा है जो थोड़ी सी किस्मत बाक़ी

आख़िरी साँस थी मैं था थे सभी रिश्तेदार
तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

एक दिन दाँतों से मिल जाएगा ग़ाफ़िल जो जवाब
दोहरे की ये रहेगी क्या तेरी लत बाकी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 08, 2018

दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

जी में रहे के होंटों पे, चाहे जहाँ रहे
करिए दुआ हज़ार ये उल्फ़त जवाँ रहे

हर सू भले अँधेरा हो चल जाएगा मगर
हर इक नज़र में प्यार का सूरज अयाँ रहे

बर्दाश्त हो भी जाएगा नुक़्सान बाग़ का
पर यह सितम न हो के नहीं बाग़बाँ रहे

यह भी सवाल ग़ौरतलब है के जिस गली
रहता न हो मक़ीन भला क्या मक़ाँ रहे

हो या न हो ये बात अलहदा है यार पर
तुझको है मुझसे इश्क़ ये मुझको गुमाँ रहे

हम आशिक़ों को शौक से कहिए बुरा भला
पर चाहिए के हुस्न भी थोड़ा निहाँ रहे

ग़ाफ़िल है यह सही है पर आशिक़ भी है तेरा
दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 05, 2018

क्या कहूँ ग़ाफ़िल जी क्या क्या मोहतरम करते रहे

क्यूँ तसव्वुर से हमारे रब्त कम करते रहे
आप कुछ इस तर्ह भी हम पर सितम करते रहे

सोचिए क्या आपसे हो भी सका वादा वफ़ा
देखिए तो यह ज़ुरूरी काम हम करते रहे

राख हम तो हो गए उल्फ़त की आतिश में फिर आप
किसको दिखलाने के बाबत चश्म नम करते रहे

अनसुनी होती रही क्यूँ फिर सदा गुंचे की और
जुल्म पंखुड़ियों पर उसके बेरहम करते रहे

उस तरह वह सब कोई भी शख़्स कर सकता नहीं
जिस तरह जो जो गुनाह अपने बलम करते रहे

जब नहीं करना था कुछ और इक मुहब्बत के सिवा
क्या कहूँ ग़ाफ़िल जी क्या क्या मोहतरम करते रहे

-‘ग़ाफ़िल’