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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, March 11, 2019

हाय किस्मत! कू-ए-जाना में न अपना घर हुआ

बाबते इश्क़ इतना समझाया गया था पर हुआ
उसपे तुर्रा यह के जिसको भी हुआ जी भर हुआ

जाँसिताँ ने जिस्म से जब खेंच ली है जान फिर
सोचना क्या यह के आख़िर क्यूँ न मैं जाँबर हुआ

रोज़ अपना चाँद खिड़की पर उतर आता मगर
हाय किस्मत! कू-ए-जाना में न अपना घर हुआ

कुछ गुलाब अपने चमन में मैंने रोपा था मगर
आस्तीं का साँप कोई कोई तो निश्तर हुआ

आग लग जाए है ग़ाफ़िल होए है जिस ठौर इश्क़
शुक्रिया कहिये के अपने शह्र के बाहर हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 01, 2019

हम प्यार की बारिश के आसार समझते हैं

हम प्यार समझते हैं व्यापार समझते हैं
तुझको तो हर इक सू से ऐ यार! समझते हैं

समझेगी भी ये दुनिया क्या ख़ाक ख़लिश दिल की
समझो तो ये हर बातें दिलदार समझते हैं

इक पल को ठहर जाएँ है इतने को ही दुनिया
हम हैं के इसे अपना घर-बार समझते हैं

कुछ और नहीं समझें मुम्क़िन है ये जाने जाँ
पर ज़ीस्त में हम अपना किरदार समझते हैं

पुरवाई का आलम है जुल्फ़ों के हैं अब्र उड़ते
हम प्यार की बारिश के आसार समझते हैं

ग़ाफ़िल जी ज़रा सोचो ख़ुश्बूओं की लज़्जत को
गर फूल नहीं तो फिर क्या ख़ार समझते हैं

-‘ग़ाफ़िल’