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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, March 27, 2020

शब भी जाती है पर सहर करके

क्या मिला इसको मुख़्तसर करके
लुत्फ़ था ज़ीस्त का सफ़र करके

मेरे जी को कभी न जी समझा
वो जो रहता है जी में घर करके

ख़्वाहिश अपनी कभी तो हो पूरी
जाए मुझको भी कोई सर करके

न मिला जो मुक़ाम जीते जी
पाते देखा है उसको मर करके

जाए जब तो ख़बर करे न करे
आए कोई तो बाख़बर करके

कोई हँसता है दर-ब-दर होकर
कोई रोता है दर-ब-दर करके

ग़ाफ़िल ऐसे ही जाना क्या जाना
शब भी जाती है पर सहर करके

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, March 19, 2020

के आप आ मिलोगे किसी रास्ते पर

मनेगी ख़ुशी आज यह मैक़दे पर
न आना था उनको जनाब आ गए पर

जो कुछ देखने सा हो उसको भले ही
नहीं देखने का हो जी देखिए पर

कहाँ जा सके जिस जगह लोग बोले
जहाँ थी मनाही वहाँ हम गए पर

है दानाई तो है मुनासिब के सोचें
न रोना पड़े ताके अपने किए पर

हुज़ूर अपनी ज़ीनत का क्या कीजिएगा
लगी हैं जो पाबंदियाँ देखने पर

बस इस ही सबब हम नहीं थम रहे हैं
के आप आ मिलोगे किसी रास्ते पर

था उल्फ़त का वह और ही दौर ग़ाफ़िल
हुए थे फ़िदा हम भी जब आईने पर

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, March 14, 2020

जो दिख नहीं रहा हूँ वो तो शर्तिया हूँ मैं

पूछो न रोज़ रोज़ के आख़िर में क्या हूँ मैं
सोचो तो सारे मर्ज़ की वैसे दवा हूँ मैं

मौसम कोई भी दिल का हो आओगे पास तो
पाओगे तपते जेठ में पुरवा हवा हूँ मैं

जैसे भी हो वो तुम हो मुझे क्यूँ हो फ़िक़्रो ग़म
कहना ये क्या है बोलो के तुझसे ख़फ़ा हूँ मैं

जो दिख रहा हूँ उसपे हमेशा सवाल उठा
जो दिख नहीं रहा हूँ वो तो शर्तिया हूँ मैं

ग़ाफ़िल रहे हैं वो ही जो कहते रहे हैं यार
आ जा न पास मेरे तेरा आसरा हूँ मैं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 13, 2020

वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

उसका हो क्या के उनके बिन महरूम
आजतक हम जो दस्तो पा से रहे
उनको रहना न वैसे रास आया
वो जो दिल में कभी ख़ुदा से रहे

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

Thursday, March 05, 2020

लगी है चोट दिल पर और ये सर पर समझता है

भले अपना तू कह कितना मगर क्या घर समझता है
मुसल्सल हाले दिल तो मील का पत्थर समझता है

समझ में यह नहीं आता के रस्ते का खटारापन
सने ख़ूँ से ये मेरे पा के यह रहबर समझता है

दिखावे के लिए कर ले तग़ाफ़ुल ठीक है गोया
मुझे है इल्म तू जी की मेरे जी भर समझता है

नहीं समझा कहे कितना भी ये माना न जाएगा
तुझे अपना बनाना मेरा तू बेहतर समझता है

जो सर पे हाथ फेरे जा रहा ग़ाफ़िल है चारागर
लगी है चोट दिल पर और ये सर पर समझता है

-‘ग़ाफ़िल’