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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, August 13, 2019

या के जज़्बातों में उलझे हुए हालात कहूँ

रोज़ क्यूँ वो ही कहा जाए जो भाए सबको
है बुरा क्या जो कभी रात को मैं रात कहूँ
आप कहिए! के कहूँ आप जो कहने को कहें
या के जज़्बातों में उलझे हुए हालात कहूँ

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, August 11, 2019

हाँ रहा मैं भी और आईना भी रहा

मैं तो था ही मेरा हौसिला भी रहा
ग़म के सौदे में अपने ख़ुदा भी रहा

एक था वक़्त ऐसा के मैं ख़ुद मेरी
जब नज़र में भी था गुमशुदा भी रहा

किर्चें सपनों की मेरे उड़ीं ता’फ़लक़
हाँ रहा मैं भी और आईना भी रहा

मेरी बर्बादी में मेरी जाने ग़ज़ल
हाथ जो भी थे उनमें तेरा भी रहा

जीत अपनी मुक़म्मल हुई यूँ के मैं
दौड़ता तो रहा हारता भी रहा

मह के मानिन्द ही मेरा महबूब है
कुछ नुमा भी रहा कुछ निहा भी रहा

बाबते हिज्र ग़ाफ़िल जी कुहराम क्यूँ
अब तसव्वुर में वो जबके आ भी रहा

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, August 02, 2019

मुस्कुराते गो ज़माना हो गया है

अब तो जाने का बहाना हो गया है
बज़्म में हर गीत गाना हो गया है

शर्म आँखों को न आई तो न आई
मुस्कुराते गो ज़माना हो गया है

आगे था पीने पिलाने का मज़ा और
अब तो बस पीना पिलाना हो गया है

हुस्न की ताबानी जाने हुस्न क्या जो
कह रहा मौसम सुहाना हो गया है

ज़ख़्म देने की नयी तर्क़ीब सोच अब
तीर नज़रों का चलाना हो गया है

लोग देते हैं मुझे तरज़ीह फिर भी
इश्क़ मुझको जब के माना हो गया है

रच नया उल्फ़त का अफ़साना ओ ग़ाफ़िल!
किस्सा-ए-मजनू पुराना हो गया है

-‘ग़ाफ़िल’