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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, December 29, 2016

कोई नहीं है यूँ जो तुम्हें आदमी बना दे

मतलब नहीं है इससे अब यार मुझको क्या दे
है बात हौसिले की वह दर्द या दवा दे

है रास्ता ज़ुदा तो मैं अपने रास्ते हूँ
उनके भी रास्ते का कोई उन्हें पता दे

ख़ूने जिगर की मेरी अब ऐसी क्या ज़ुरूरत
तुमको पड़ी है जो तुम कहते हो कोई ला दे

हो किस मुग़ालते में अब यह भरम न पालो
कोई नहीं है तुमको जो आदमी बना दे

माना न जाएगा यह उसका क़ुसूर ग़ाफ़िल
कोई अगर तुम्हारा जी बुझ चुका जला दे

-‘ग़ाफ़िल’

तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

न तू बोलेगा तुझको क्या पुराना याद आता है
तो ले मुझसे ही सुन ले मुझको क्या क्या याद आता है

मुझे तो, रंग में आकर तेरा वह ग़ुस्लख़ाने में
फटे से बाँस जैसा सुर मिलाना, याद आता है

जब अपने सह्न की यारो मुझे है घास छिलवानी
तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

कहीं अब मौज़ में आकर लुगाई से न कह देना
के तू मारी थी जो पहला तमाचा याद आता है

तेरी तो तू कहे ग़ाफ़िल मुझे तो अब शबे हिज़्राँ
न कोई और बस इक तू लड़ाका याद आता है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 28, 2016

बात हो जाए अब आर या पार की

जी में सूरत उभर आई फिर यार की
इस क़दर कोई पाज़ेब झंकार की

हुस्न के शह्र में मैं भटक जाता पर
याद उसकी हमेशा ख़बरदार की

हूँ मैं हैरान आई कहाँ से भला
ख़ासियत हुस्न में सिप्हसालार की

बेरुख़ी हुस्न वालों की फ़ित्रत है जब
ख़ाक लेंगे ख़बर अपने बीमार की

कर चुका मैं बहुत इंतिज़ार इश्क़ में
बात हो जाए अब आर या पार की

था न मालूम उड़ जाएँगी धज्जियाँ
अंजुमन में तेरी मेरे अश्आर की

है ख़ुशी का न ग़ाफ़िल ठिकाना मेरे
आज पहली दफ़ा उसने तक़रार की

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, December 27, 2016

ख़ूबसूरत शै को अक़्सर देखिए

मेरा दिल है आपका घर देखिए
जी न चाहे फिर भी आकर देखिए

आप हैं, मैं हूँ, नहीं कोई है और
क्या मज़ा हाेे ऐसे भी गर देखिए

देखते रहने से बढ़ जाती है शान
ख़ूबसूरत शै को अक़्सर देखिए

मेरी तो हर ख़ामियाँ बतला दीं, अब
वक़्त हो तो ख़ुद के अन्दर देखिए

मैं दिखाता हूँ अब अपना हौसला
जैसा देखा उससे बेहतर देखिए

हुस्न बेपर्दा हुआ तो लुत्फ़ क्या
नीम पर्दा उसके तेवर देखिए

माना ग़ाफ़िल लौटकर आएँगे आप
रस्म है, फिर भी पलटकर देखिए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 26, 2016

राहे उल्फ़त पे वो ग़ाफ़िल जी! मगर जाते हैं

देखा करता हूँ उन्हें शामो सहर जाते हैं
पर न पूछूँगा के किस यार के घर जाते हैं

मैं हज़ारों में भी तन्हा जो रहा करता हूँ
वो ही बाइस हैं मगर वो ही मुकर जाते हैं

है हक़ीक़त के कभी वो तो मेरे हो न सके
चश्म गो मैं हूँ बिछाता वो जिधर जाते हैं

आईना साथ लिए रहता हूँ मैं इस भी सबब
लोग कहते हैं वो शीशे में उतर जाते हैं

आह! डर जाने की फ़ित्रत न गयी उनकी अभी
देखते क्या हैं जो वो ख़्वाब में डर जाते हैं

बारिशे रह्मते रब में हैं अगर भीग गये
ज़िश्तरू भी तो यहाँ यार सँवर जाते हैं

वैसे आता ही नहीं इश्क़ निभाना उनको
राहे उल्फ़त पे वो ग़ाफ़िल जी! मगर जाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, December 25, 2016

जो जलाने आ गए अपनों के ही साए मुझे

हुस्न के अरजाल में क्या वे फँसा पाए मुझे
गो के कबका हो चुका है इस तरफ़ आए मुझे

फलसफा-ए-इश्क़ ख़ुद जिसको समझ आया नहीं
है सवाल अब यह के वह किस तर्ह समझाए मुझे

काश! जी की ज़ुर्रतों में यह भी हो जाए शुमार
आईना बनकर वो अपने रू-ब-रू लाए मुझे

झेलना क्या कम था मेरा यार ताबानी-ए-शम्स
जो जलाने आ गए अपनों के ही साए मुझे

देखिए ग़ाफ़िल जी! गोया लुट चुका जी का चमन
दे रहे लेकिन तसल्ली फूल मुरझाए मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 17, 2016

होगा आगे जो भी देखा जाएगा

उठके जब मेरा जनाज़ा जाएगा
है यक़ीं इतना के तू आ जाएगा

बह्र से मिलने अब आगे देखिए
दर्या जाएगा के सोता जाएगा

कर दो बस साबित के उल्फ़त है गुनाह
फिर तो उसका लुत्फ़ बढ़ता जाएगा

राम जाने क्या हुआ जी को मेरे
दर से तेरे ही आवारा जाएगा

आप ग़ाफ़िल जी लिखे जाओ अश्आर
होगा आगे जो भी देखा जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 10, 2016

सब हमारा ही नाम लेते हैं

जामे लब शब् तमाम लेते हैं
लेकिन उल्फ़त के नाम लेते हैं

दिल पे तीरे नज़र चलाके ग़ज़ब
आप भी इंतकाम लेते हैं

ज़िक़्रे आशिक़ अगर हो महफ़िल में
सब हमारा ही नाम लेते हैं

था न मालूम इश्क़ में बेगार
आप भी सुब्हो शाम लेते हैं

काढ़ा-ए-दीद, हम मुहब्बत का
जब भी होता जुक़ाम, लेते हैं

इश्क़ हमने किया है पर टेंशन
याँ क्यूँ हर ख़ासो आम लेते हैं

छूट जाए मजाल क्या ग़ाफ़िल
हम कलाई जो थाम लेते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, December 08, 2016

तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है

गो आदत न थी डूबने की मेरी पर
तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है
गया मैं सहर को अगर तेरे दर से
मुझे शाम तक लौट आना पड़ा है

-‘ग़ाफ़िल’


Wednesday, December 07, 2016

अब सवाले इश्क़ पर तू हाँ कहेगा या नहीं

पेचो ख़म बातों का, तेरी ज़ुल्फ़ों सा सुलझा नहीं
अब सवाले इश्क़ पर तू हाँ कहेगा या नहीं

मेरी उल्फ़त की उड़ाई जा रही हैं धज्जियाँ
यह तमाशा क्या मेरे मौला तुझे दिखता नहीं

है वजूद इन आईनों का अब तलक जो बरक़रार
शायद इनके सामने आया कोई मुझसा नहीं

मुस्कुराना ही फ़क़त है बाँटना खुशियाँ तमाम
मुस्कुराकर देख तेरा कुछ भी जाएगा नहीं

लोग कुछ मेरे लिए पाले हुए हैं यह फ़ितूर
कहने को ग़ाफ़िल है पर है वाक़ई ऐसा नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 05, 2016

किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

भले दिन रात हरचाता बहुत है
मगर मुझको तो वह प्यारा बहुत है

वो हँसता है बहुत पर बाद उसके
ख़ुदा जाने क्यूँ पछताता बहुत है

जुड़ा है साथ काँटा जिस किसी के
उसी गुल का यहाँ रुत्बा बहुत है

है जिसके हर तरफ़ पानी ही पानी
समन्दर सा वही प्यासा बहुत है

मैं जगता रोज़ो शब हूँ इसलिए भी
के वक़्ते आखि़री सोना बहुत है

अगर ख़ुद्दार है तो डूबने को
सुना हूँ आब इक लोटा बहुत है

है राह आसान रुस्वाई की सो अब
उसी पर आदमी चलता बहुत है

न हो पाया भले इक शे’र तो क्या
किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’