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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, October 25, 2021

मैं वो चाहूँ ही भला क्यूँ जो ज़माना चाहे

जान चाहेगा नहीं जान सा माना चाहे
चाहिए चाहने देना जो दीवाना चाहे

दिल का दरवाज़ा हमेशा मैं खुला रखता हूँ
कोई आ जाए अगर शौक से आना चाहे

मैं नहीं बोलूँगा उसको के बहाए न कभी
अश्क उसके हैं बहा दे जो बहाना चाहे

रोक तो सकता हूँ दर्या की रवानी मैं अभी
रोकूँ पर कैसे उसे जी से जो जाना चाहे

अपनी चाहत भी निराली है जहाँ से ग़ाफ़िल
मैं वो चाहूँ ही भला क्यूँ जो ज़माना चाहे

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, October 01, 2021

नाक भी बाकी रहे मै भी उड़ा ली जाए

थोड़ी शिक़्वों की शराब आपसे पा ली जाए

क्यूँ नहीं ऐसे भी कुछ बात बना ली जाए


आप तो वैसे भी मानेंगे नहीं अपनी कही

क़स्म ली जाए भी तो आपकी क्या ली जाए


कोई तरक़ीब तो निकलेगी ही गर सोचेंगे

नाक भी बाकी रहे मै भी उड़ा ली जाए


इश्क़ की जंग में ऐसा हो तो क्या हो के अगर

तीर चल जाए मगर वार ही खाली जाए


ज़िन्दगी चार ही दिन की है भले ग़ाफ़िल जी

क्यूँ मगर दर से कोई खाली सवाली जाए


-‘ग़ाफ़िल’