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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, June 30, 2020

आदमी है आदमी अपनी बदौलत

ले लो ये बज़्मे सुखन वाली रियासत
मुँह नहीं ही लगने की अपनी है आदत

कुछ न पाओगे तग़ाफ़ुल करके मुझसे
सोचते हो गर के मिल जाएगी इश्रत

क्यूँ किसी को इश्क़ में रुस्वा करूँ पर
कर तो सकता हूँ मैं गो ऐसी हिमाक़त

है ज़ुरूरी यह के याद इतना रहे ही
आदमी है आदमी अपनी बदौलत

ढूँढते ग़ाफ़िल हैं सारे इश्क़ में क्या
इश्क़ है ख़ुद आप ही में जबके नेमत

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 23, 2020

अभी भी है कुछ अच्छा देखने को

न पूछ आया यहाँ क्या देखने को
बता यह क्या है रक्खा देखने को

थी ख़्वाहिश देखने की तेरा चेहरा
मगर मिलता है क्या क्या देखने को

यहाँ हर शै है संज़ीदा बहुत ही
मैं आया था तमाशा देखने को

सुक़ून आया नहीं अब तक जो शायद
अभी भी है कुछ अच्छा देखने को

न आता मैं सदा जो ये न आती
के ग़ाफ़िल अब चला आ देखने को

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 10, 2020

कोई अपना ही दूसरा समझे

😔

तू ही जो मुझको ग़ैर समझा है फिर
क्यूँ न दुनिया मुझे तेरा समझे
जीना चाहे भी कोई क्यूँ जब उसे
कोई अपना ही दूसरा समझे

-‘ग़ाफ़िल’