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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, December 28, 2015

ग़मज़दा हैं दूर से मेरा जनाज़ा देखकर

मेरी सीरत देखकर या मेरा रुत्बा देखकर
आपने मुझको बहुत चाहा था पर क्या देखकर

मैं भला यह क्यूँ कहूँ जलता मेरा जी है बहुत
ग़ैर जानिब आपको यूँ मुस्कुराता देखकर

क्यूँ पशेमाँ हो रहे अब पास भी आ जाइए
ग़मज़दा हैं दूर से मेरा जनाज़ा देखकर

है पता यह हुस्न है मिह्मान बस कुछ रोज़ का
टीस पर उट्ठेगी जी में उसको जाता देखकर

क्या बताऊँ हैं परीशाँ किस तरह सारे रक़ीब
तीर नज़रों का मेरे सीने पे चलता देखकर

हो न हैरानी जिसे वह ख़ाक फ़र्माएगा इश्क़
आपका दामन ये उड़ता बादलों सा देखकर

दाद तो भरपूर मिलती है मगर क्यूँ लग रहा
शे’र सुनकर कम, बहुत ग़ाफ़िल का चेहरा देखकर

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 26, 2015

तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

ग़म थोड़े बहुत यूँ तो तुमको भी सताएँगे
पर हुस्न का जल्वा है सब हार के जाएँगे

कोई भी नहीं अपना पर फ़िक़्र नहीं कुछ भी
करना है जो हमको वह हम करके दिखाएँगे

यूँ हुस्न के दीवाने माना के हज़ारों हैं
पर इश्क़ बिना वे सब क्या लुत्फ़ मनाएँगे

जाता है किसी का क्या जो शोर मचाते सब
आदत की है मज़्बूरी हम प्यार निभाएँगे

चलते ही रहो प्यारे मंज़िल है अगर पानी
तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

इस इश्क़े बियाबाँ से ग़ाफ़िल ही गुज़रता है
क्या आप सभी सब कुछ जानेंगे तो आएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, December 25, 2015

न हो बर्दाश्त गर तो यह गुनाहे यार लिख देना

भले ही जीत अपनी और मेरी हार लिख देना
मगर सहरा-ए-दिल पे अब्र के आसार लिख देना

सरे महफ़िल तुझे अपना कहा तस्लीम करता हूँ
न हो बर्दाश्त गर तो यह गुनाहे यार लिख देना

ज़मीं से आस्माँ तक इश्क़ की आवाज़ तिर जाए
भले ही चंद पर इस वज़्न के अश्‌आर लिख देना

उफ़नती सी नदी भी बेहिचक मैं तैर जाता हूँ
मेरी किस्मत में रब मत क़श्ती-ओ-पतवार लिख देना

कभी फ़ुर्सत मिले ग़ैरों से तो मेरे भी आरिज़ पे
भले बेमन ही ग़ाफ़िल जी लबों से प्यार लिख देना

आरिज़=गाल

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, December 18, 2015

के अच्छे दिन भी आएँगे

जो फोड़े भार इक ऐसा चना अब हम उगाएँगे
तमाशा जो नहीं अब तक हुआ हम कर दिखाएँगे
चलो अच्छा हुआ के आपने वादा न फ़र्माया
नहीं हम सोचते रहते के अच्छे दिन भी आएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, December 17, 2015

आपके ही लिए है मेरी ज़िन्दगी

जिस्म भी आपका जान भी आपकी
आपके ही लिए है मेरी ज़िन्दगी

आपके रुख़ से पर्दा हटा दफ़्‌अतन
दफ़्‌अतन जाँ हलक तक मेरी आ गयी

सोचते सोचते वक़्त गुज़रा किया
देखते देखते आस मुरझा गयी

मैं बहुत ही जतन से सहेजा मगर
हो गयी आज रुस्वा मेरी आशिक़ी

आईना तो मेरे बर मुक़ाबिल रहा
आपने ही कहाँ मेरी तारीफ़ की

आपको ज़र्ब कुछ भी न आएगा पर
जान लेगी मेरी आपकी रुख़्सती

आप जाते हैं तो शौक से जाइए
आपको याद ग़ाफ़िल की आएगी ही

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 12, 2015

मत समझ लेना इसे सर का झुकाना

हिज़्र के हालात में आँसूं बहाना
क्या नहीं है इश्क़ को रुस्वा कराना

गर कहूँ भी तो भला किससे कहूँ मैं
वादा-ए-वस्लत का तेरा भूल जाना

तू बता के मैं भला मुफ़लिस कहाँ जब
पास मेरे है मेरे दिल का खज़ाना

मैं करूँ भी किस तरह बर्दाश्त, तेरा
देखकर ग़ैरों की जानिब मुस्कुराना

दे रहा आवाज़ कोई क्यूँ मुझे अब
तै हुआ है जब मेरा इस दर से जाना

शोख़ी-ए-जाना पे ग़ाफ़िल है फ़िदा पर
मत समझ लेना इसे सर का झुकाना

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, December 10, 2015

हो गये कितने मुख़ालिफ़ आजके मंज़र सभी

क्यूँ क़लम करने को आमादा हो मेरा सर, सभी
हो गये कितने मुख़ालिफ़ आजके मंज़र सभी

इस गली से उस गली तक के निशाँ मेरे ही हैं
घिस गये चलने से मेरे राह के पत्थर सभी

क्यूँ भला, जो एक शम्‌अ जल उठी तो ख़ुद-ब-ख़ुद
जल रहे आकर उसी में पास के अख़्गर सभी

आप मानें या न मानें ख़ासियत कुछ है ज़ुरूर
वर्ना क्यूँ तारीफ़ करते आपकी अक्सर सभी

शे'र मेरे अब तलक बेकार थे बर्बाद थे
आपके होंटों को छूकर हो गये बेहतर सभी

जीत जाएँगे यक़ीनन शक नहीं ग़ाफ़िल ज़रा
हार कर पहले दिखाएँ आशिक़ी में पर सभी

अख़्गर=पतिंगा

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 07, 2015

इस ज़मीं ने गले लगाया था

आस्माँ जब मुझे गिराया था
इस ज़मीं ने गले लगाया था

बस वही बात रह गयी कहनी
ख़ास जो सोच करके आया था

कैसे कह दूँ के था वो तू ही तो
दिल जो मेरा कभी चुराया था

आज तू कर रहा किनारा क्यूँ
जब मुझे कल ही आजमाया था

थी मगर जूँ सराब मंज़िल ही
राहबर तो छँटा छँटाया था

गैर की थी मज़ाल क्या ग़ाफ़िल
आईना ही मुझे रुलाया था

सराब=मृगमरीचिका

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, December 04, 2015

ज़िन्दगी इस तरह भली है क्या

ये मुहब्बत नयी नयी है क्या
आग जी में कभी लगी है क्या

क़त्ल होकर मुआफ़ करती है
ज़िन्दगी इस क़दर भली है क्या

बात कुछ है जो ख़म हुईं नज़रें
आँख ग़ैरों से फिर लड़ी है क्या

कोई बतलाएगा के अक्सर वो
आईने में ही खोजती है क्या

जैसे मह्सूस हो रूमानी कुछ
उसकी चर्चा यहाँ चली है क्या

यार ग़ाफ़िल नशा-ए-दौलत, अब
ज़िन्दगी से भी क़ीमती है क्या

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 02, 2015

औ नमी है तो फिर तिश्नगी किसलिए

यार आँखों में यूँ है नमी किसलिए
औ नमी है तो फिर तिश्नगी किसलिए

रूठने और मनाने की आदत नहीं
फिर किया आपने आशिक़ी किसलिए

नाफ़रामोश हैं, होश है, जोश है
फिर भी रिश्तों में मुर्दानगी किसलिए

आदमी आज तक जंगली ही रहा
बस बदलती रही है सदी, किसलिए

एक हद तक हैं पर्दे के क़ाइल सभी
फिर बदन की ये बेपर्दगी किसलिए

घर वही, रुत वही, वो ही क़िर्दार है
आईने की उड़ी खिलखिली किसलिए

उसको मालूम क्या ज़िन्दगी का मज़ा
जो कहे जा रहा दिल्लगी किसलिए

अब तलक दर-ब-दर है भटकती रही
एक ग़ाफ़िल की ज़िन्दादिली किसलिए

-‘ग़ाफ़िल’