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Saturday, March 15, 2014

जेब भर खाली होगी

यह शहरे-ग़ाफ़िल है अदा भी निराली होगी
वक़्ते-इश्तक़बाल हर ज़ुबान पर गाली होगी

रुख़े-ख़ुशामदी ही खिलखिलाएगा अक्सर
और तो ठीक है पर बात ही जाली होगी

होगी होली भी और हीलाहवाली होगी
भरी दूकान होगी जेब भर खाली होगी

जिसकी दरकार जहां होगा दरकिनार वही
पुश्त में बीवी होगी रू-ब-रू साली होगी

रोज़ होगा सियाह और शब उजाली होगी
दिखेगा सब्ज़ मगर झमकती लाली होगी

नहीं मिसाल और होगा अहले दुनिया में
के क़ैस गोरा होगा लैला ही काली होगी

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, March 09, 2014

अब आई जान में जान

चलो!
ले दे के गहमी गहमा के बीच
हो ही गया नारी-दिवसावसान
आज पूरा दिन अति सतर्क रहा
मेरा आत्मसम्मान
मित्रों!
सच यह है कि
अब आई जान में जान
क्योंकि
संयोग से
मैं भी हूँ एक नारी-शुदा इंसान

Sunday, September 11, 2011

कहैं सब गालोबीबी

गालोबीबी जो दिखी, तरुन नयन की भ्रान्ति।
रहकर परदूसित जगह, बिगड़ गई मुँह कान्ति॥
बिगड़ि गई मुँह कान्ति, रहा ना कहीं ठिकाना;
घरमा हो या घर के बाहर, हुआ बेगाना।
ग़ाफ़िल कैसे समझाए की क्या है ख़ूबी?
मुँह मा दोहरा भरा कहैं सब गालोबीबी॥

(इस रचना का उत्स, मेरे एक अभिन्न मित्र, जो कभी अपने को 'तरुन' कहलाने की मशक्कत में थे, का मेरे लिए इस सवाल कि- 'तुम बोलते क्यों नहीं! गालोबीबी हुई है क्या?' में निहित है। गालोबीबी= मेरे शुभचिन्तक सुधीजनो गालोबीबी एक प्रकार का गले का रोग होता है जो इन्फैक्शन से हो जाता है। इसमें गले पर सूजन आ जाती है आदमी न तो खा सकता है और न ही बोल सकता है। फीवर भी हो जाता है और आदमी कमजोरतर होता जाता है। यह वायरल बीमारी है जिसके लिए हार्ड एंटीबॉयोटिक लेनी पड़ती है। तब जाकर बहुत झेलाने के बाद कहीं ठीक होता है। मेरे अंचल में इस बीमारी को गालोबीबी कहा जाता है हो सकता है अन्यत्र इसे और कुछ कहा जाता हो। इसकी व्याख्या इस लिए करनी पड़ रही है कि हमारे बहुत से शुभचिन्तक इसके बारे में जानते ही नहीं या जानते भी हों तो किसी और नाम से।)
                                                                                   -ग़ाफ़िल

Monday, June 27, 2011

वन्दहु सदा तुमहि प्रतिरक्षक

जै जै प्रतिरच्छक जै हे सोक निवारक!
जै हो तुम्हार हे सब नीचन के तारक।

तुम हो त्रिदेव कै रूप बुद्धि-बल खानी,
संग सूरसती लछमी औ रहति भवानी।

सब कहनहार चाहे जौ मुँह मा आवै,
ऊ बतिया चाहे केतनौ का भरमावै।

सब ठीकै है जौनै कुछ तुमहि सुहायी,
पानी पताल से की सरगे से आयी।

तुम आला हाक़िम हौ तुम्हार सब चाकर,
तुम सब केहू कै ईस सरबगुन आगर।

सब कुछ तुम्हकां छाजै जउनै कै डारौ,
मनई का पैदा करौ या मनई मारौ।

ई ग़ाफ़िल मूरख नाय जो अलग नसावै,
सबके साथे मिलि गुन तुम्हार ही गावै।
                                                       -ग़ाफ़िल

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Wednesday, June 15, 2011

ग़ाफ़िल का ढाबा (चीनी मिल परिसर, बभनान, में हुए कवि सम्मेलन की पुष्पिका)

आइए! हम आपको कविता जिमाते हैं।
हम कविता के पाकशास्त्री हैं,
बड़ी लज़ीज कविता बनाते हैं।।

क्या खाइएगा? वही न! जो हम पकाएंगे,
हम परोसेंगे और आप खाते ही जाएंगे।
क्योंकि हमारे परोसने का अन्दाज है निराला,
कविता भले ही कच्ची हो,

पर मजेदार होगा हर निवाला।।

ये मेरा दावा है कि आप नहीं होंगे बोर,
इत्मिनान रखिए! छन्दों के बर्त्तनों में
होता नहीं है शोर।
ये आपस में कभी-कभार टकराते तो जरूर हैं,
पर बड़े ही प्रेम से, आदत है, मगरूर हैं।।

दोहा, घनाक्षरी, चौपाई, पद हो या सवईया,
बड़े ही सुपाच्य हैं, हज़मुल्ला की जरूरत नहीं
बस खाइए भईया।।

इस घनाक्षरी की थाली में देश-भक्ति की पूरियां
जो कड़कड़ाती दिखायी दे रही हैं, घबराइए नहीं!
इसमें देशी घी का मोयन है जादा, मुँह में रखते ही
गल जाएंगी, आप मस्त हो जाएंगे ऐसा है मेरा वादा।।

हम नहीं कहते कि इसे खाकर आप 

भगत सिंह, हमीद और आज़ाद हो जाएंगे
पर इतना है कि पत्नी के आगे ही सही,
आपके बाजू, चाहे हवा में ही, ज़ुरूर फड़फड़ाएंगे।।

इसको ‘बौखल’ और ‘बौझड़’ की हास्य चटनी के साथ
खाइए, ‘वाहिद’ के साम्प्रदायिक सद्भाव के मिक्सवेज़
का भी लुत्फ़ उठाइए अथवा ‘सुरेश’ की यायावरी प्रवृत्ति
को अपनाना हो जरूरी, तो एक मुखौटा ‘विजय
का अवश्य
खरीदिए वर्ना यात्रा रह जाएगी अधूरी।।

अब चूँकि गेहूँ के दाने, चावल, और समस्त खद्यान्न

यहां तक कि जंगल, जानवर और जंगली उत्पाद
सब कुछ ‘आशू’ भाई के मुताबिक होने जा रहे हैं
लोरियों और कहानियों में, तो अभी भी समय है
चेत जाइए और आइए
ग़ाफ़िल के ढाबे में आइए!

‘सन्त’ समागम की भक्ति-प्रेम-रस पूरित तस्मयी का
मज़ा है कुछ और, हाँ!
ग़ाफ़िल के ढाबे की यह
‘व्याख्या’ गर समझ में न आए तो चुप-चाप
चले जाना मत करना कुछ शोर वर्ना
हम पाकशास्त्रीगण लाल-पीले हो जाएंगे
और आप हो जावोगे बोर।
                                                               -ग़ाफ़िल