यह शहरे-ग़ाफ़िल है अदा भी निराली होगी
वक़्ते-इश्तक़बाल हर ज़ुबान पर गाली होगी
रुख़े-ख़ुशामदी ही खिलखिलाएगा अक्सर
और तो ठीक है पर बात ही जाली होगी
होगी होली भी और हीलाहवाली होगी
भरी दूकान होगी जेब भर खाली होगी
जिसकी दरकार जहां होगा दरकिनार वही
पुश्त में बीवी होगी रू-ब-रू साली होगी
रोज़ होगा सियाह और शब उजाली होगी
दिखेगा सब्ज़ मगर झमकती लाली होगी
नहीं मिसाल और होगा अहले दुनिया में
के क़ैस गोरा होगा लैला ही काली होगी
-‘ग़ाफ़िल’