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Saturday, March 29, 2014

क्या खोया? क्या पाया?

        दो सगे भाई थे। दोनों आशिक़ थे। दोनों की अपनी-अपनी मा’शूक़ा थीं। दोनों उनसे बहुत प्यार करते थे और उनकी मा’शूक़ाएं भी उनपर दिलो-जान से न्योछावर थीं। अपने-अपने आशिक़-मा’शूक़ा को देखे बिना किसी के जी में कल न आती थी। न मिलने पर बेचैनी और मिलने पर बिछड़ जाने की बेचैनी क्या बड़े सुहाने दिन गुज़र रहे थे। एक दिन लोगों ने सोचा कि हम शादी क्यों न करके एक दूजे के हो जायें और सारी उम्र साथ ही गुज़ारें, यह छिप-छिपकर मिलना, दुनिया से नज़रें चुराना, ये बेचैनियों के जख़ीरे अब बरदाश्त नहीं। सो अपने-अपने अभिवावकों से प्रेमियों ने बात की और अभिवावकों की सहमति से उन सबकी विधिवत् शादी कर दी गयी। अर्सा पाँच साल से प्रेमीगण बतौर मिंयाँ-बीवी साथ-साथ रह रहे हैं।
        आज अचानक छोटा भाई दौड़ा-दौड़ा बड़े भाई के पास गया। अन्यमनस्क और उद्विग्न छोटे भाई को देखकर बड़े भाई ने कुशल पूछा तो छोटे भाई के मुंह से अनायास यह सवाल निकला- ‘‘भईया हमारी एक एक मा’शूक़ा थी वह वह बीवियों में नहीं दिखती कहां गयी?’’ बड़े भाई ने सवाल को तपाक से लपकते हुए बोला- ‘‘छोटे! पिछले तीन साल से हमें यही सवाल घुन की तरह चाटे जा रहा है जिसका हल मैं नहीं खोज पाया। ऐसा करते हैं चलो फ़क़ीर साहब से पूछते हैं ’’
        फिर दोनों फ़क़ीर साहब कि पास गये और अपना सवाल दुहराया। सवाल सुनकर फ़क़ीर साहब बिना देर लगाए ही बोल उठे कि- ‘‘बच्चा! तुम दोनों की मा’शूक़ा अब बीबियों में तब्दील हो चुकी हैं उसमें मा’शूक़ा न तलाशो, एक ही समय में एक ही औरत बीबी और मा’शूक़ा दोनों नहीं हो सकती इसी तरह पुरुषों पर भी लागू होता है और यही सवाल तो कल तुम्हारी बीवियाँ भी पूछने आई थीं मुझसे। अब आप सब केवल और केवल मिंयाँ-बीवी हो, एक सामाजिक समझौता और उससे मुताल्लिक़ फ़र्ज़ को ख़ुशी-ख़ुशी निभाओ! उम्र यूँ भी कट जाती है।’’
        अब दोनों के सामने सवाल यह है कि क्या खोया? क्या पाया? जिसका हल शायद वे ता’उम्र तलाशते रहें हम उनके सेहतमंद और सुखी शादीशुदा ज़िन्दगी की कामना करते हैं। आमीन।