Showing posts with label नज़्म. Show all posts
Showing posts with label नज़्म. Show all posts

Tuesday, June 18, 2013

मैं तुझे आजमा के देख लिया

ख़ूब अपना बना के देख लिया
मैं तुझे आजमा के देख लिया
तुझको ख़ुश देखने की ख़्वाहिश में
मैंने ख़ुद को गंवा के देख लिया

बात करके मुझे बेज़ार न कर!
हो चुका ख़ूब अब लाचार न कर!
तेरी ख़ुदगर्ज़ियाँ छुपी न रहीं
बख़्श दे मुझको और प्यार न कर!

अब तो अपना जमाना चाहता हूँ
ख़ुद को अब आजमाना चाहता हूँ
तेरी ख़ुशियों से मैं क्यूँ ख़ुश होऊँ
ख़ुद की ख़ुशियों में जाना चाहता हूँ।।

Thursday, December 27, 2012

कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज

ईलाज-

राख करने के सबब ज़ुल्मो-सितम
लाज़िमी है कुछ हवा की जाय और
उस लपट की ज़द में तो आएगा ही
शाह या कोई सिपाही या के चोर

एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम
रोने-धोने से नहीं अब फ़ाइदा
अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द
बस यही तो क़ुद्रती है क़ाइदा

वर्ना जब नासूर वो हो जाएगी
तब नहीं हो पायेगा कोई इलाज
बदबू फैलेगी हमेशा हर तरफ़
कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज

-‘ग़ाफ़िल’


Wednesday, December 12, 2012

सोचना रोटी है आसाँ

सोचना रोटी है आसाँ पर बनाना है जटिल
ख़ूबसूरत राग है पर यह तराना है जटिल

क्या यही लगता है रोटी आज दे दोगे उसे
इस क़दर बेकस व बेबस फिर न देखोगे उसे

उसके हक़ में है कि यह त्रासद अवस्था झेल ले
हौसला दो राह के पत्थर को ख़ुद ही ठेल ले

यार ग़ाफ़िल! एक मौका भर उसे अब चाहिए
रोटियाँ ख़ुद गढ़ सके ऐसा उसे ढब चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.