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Friday, August 02, 2019

मुस्कुराते गो ज़माना हो गया है

अब तो जाने का बहाना हो गया है
बज़्म में हर गीत गाना हो गया है

शर्म आँखों को न आई तो न आई
मुस्कुराते गो ज़माना हो गया है

आगे था पीने पिलाने का मज़ा और
अब तो बस पीना पिलाना हो गया है

हुस्न की ताबानी जाने हुस्न क्या जो
कह रहा मौसम सुहाना हो गया है

ज़ख़्म देने की नयी तर्क़ीब सोच अब
तीर नज़रों का चलाना हो गया है

लोग देते हैं मुझे तरज़ीह फिर भी
इश्क़ मुझको जब के माना हो गया है

रच नया उल्फ़त का अफ़साना ओ ग़ाफ़िल!
किस्सा-ए-मजनू पुराना हो गया है

-‘ग़ाफ़िल’

4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 03 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  3. उम्दा प्रस्तुती ।

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