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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, December 09, 2020

हम हैं फिर प्यार का मुहूरत है


मेरी जानिब से आप सबको दो क़त्आत नज़्र किये जाते हैं मुलाहिज़ा फ़र्माएँ!

1.
है मुसन्निफ़ की कोई जाने ग़ज़ल
या मुसब्बिर की कोई मूरत है
ख़ूबसूरत फ़क़त न कहिए इसे
हुस्न तो इश्क़ की ज़ुरूरत है

2.
देखिए! ग़ौर कीजिए इसपर
बाद अर्से के ऐसी सूरत है
क्या नमूज़ी बताएगा इसको
हम हैं फिर प्यार का महूरत है

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 07, 2020

अच्छा नहीं आया!!

बताएँ क्यूँ के हमको अब तलक क्या क्या नहीं आया
हाँ ये है सामने वाले को भरमाना नहीं आया

जो कहना था न कह पाए हों शायद हम सलीके से
है मुम्क़िन यह भी शायद उनको ही सुनना नहीं आया

अदा क़ातिल है ये भी उनके दर जाओ न तो उनका
बड़ी मासूमियत से बोलना अच्छा नहीं आया!!

कुछ और आसान हो जाता हमारा मरना उल्फ़त में
सुना जाता जो नामाबर के ख़त उनका नहीं आया

यक़ीनन लुत्फ़ आएगा जो चाहो तज़्रिबा कर लो
कोई ग़ाफ़िल कहे जब उनका संदेशा नहीं आया

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 02, 2020

मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

ज़ुनून आने का क्यूँ न जाना हो गर
और आए भी क्या जो हम आकर चले
चलो ख़ैर आए हम अक़्सर यहाँ
मगर क्या के अक़्सर लज़ाकर चले

-‘ग़ाफ़िल’