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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, March 26, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : मेरा चेहरा ख़ामख़ा देखो गुलाबी कर दिया

1.
राह मंज़िल की अब्र से पूछूँ
इससे बेहतर है मैं भटक जाऊँ
2.
उम्र गिनिएगा तो मौसम बेमज़ा हो जाएगा,
देखते रहिए मिज़ाज औ लुत्फ़ जी भर लीजिए।
3.
आजकल तो आईना भी पार कर जाता है हद,
मेरा चेहरा ख़ामख़ा देखो गुलाबी कर दिया।
4.
कोई तद्‌बीर कर फिरसे मेरी पहचान वापिस हो,
तेरा ही नाम लेकर लोग मुझको याद करते हैं।
5.
मेरे महबूब का नाम आप मुझसे पूछते हो क्यूँ
सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा
6.
ग़ैरों की बगिया के गुड़हल में भी क्या आकर्षण है जो,
अपने आगन का गुलाब भी लगता है फीका फीका सा।
7.
क़त्ल हो जाए न सच का फिर सफ़ाई से यहाँ
हाथ रख क़स्‍में उठीं फिर गीता-ओ-क़ुर्‌आन पर

Tuesday, March 24, 2015

क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ

स्वच्छ धवल आँचल लहराती,
नागिन के समान बलखाती,
कलकल कर बहती नदिया में,
कंकड़ एक मार कर मैं क्यूँ
खलनायक जग में कहलाऊँ,
क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ।