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Tuesday, January 30, 2018

ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

भले ही बेलने को रोटियाँ बेलन उठाते हैं
लगे पर ठोंकने मुझको अभी बालम जी आते हैं

सितारों से मेरा दामन सजाने की अहद कर वो
मेरे सीने पे तोपो बम व बन्दूकें चलाते हैं

बलम जी आ तो जाते हैं मेरे सपने में अक़्सर पर
कभी ख़ुद बनके आते हैं कभी मुझको बनाते हैं

नहीं गाली इसे मानो ये है इज़्हारे उल्फ़त ही
जो मैं उनको सुनाता हूँ जो वो मुझको सुनाते हैं

घटाओं सी मेरी ज़ुल्फ़ों को झोंटे का लक़ब देकर
उसी बाबत बलम जी बारहा कुछ बुदबुदाते हैं

मुसन्निफ़ हैं अदा से बह्र में कुछ भी हो कर देंगे
ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, November 03, 2017

मगर इंसान डरकर बोलता है

नहीं मालूम क्यूँकर बोलता है
ये जो मेढक सा टर टर बोलता है

न थी चूँ करने की जिस दिल की हिम्मत
वो अब ज़्यादा ही खुलकर बोलता है

जवानी की तो किर्चें भी हैं ग़ायब
नशा फिर भी चढ़ा सर बोलता है

क़फ़स में शर्तिया है देख लो जा
परिंदा मेरे सा गर बोलता है

नहीं हैं तोप फिर भी बीवियों से
हर इक इंसान डर कर बोलता है

मज़ाक़ इससे भला क्या होगा अच्छा
तू कैसा है सितमगर बोलता है

करम फूटा था जो ग़ाफ़िल हुआ था
सुख़नवर मुझसा अक़्सर बोलता है

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, April 24, 2017

सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

होते फिर शे’र मेरे क़ाफ़िया क्या क्या लेकर
बात बन जाती लुगत का जो सहारा लेकर

लिख दिया मैंने अभी एक अजूबा सी हज़ल
कह दो तो पढ़ दूँ यहाँ नाम ख़ुदा का लेकर

एक क़त्आ-

वैसे तो जी में मेरे आप अब आने से रहे
और मालूम है आएँगे भी तो क्या लेकर
फिर भी आ जाइए है रात गुज़रने वाली
वास्ते मेरे भले दर्द का गट्ठा लेकर

और तमाम अश्आर-

जैसे अरमानों का बाज़ार हुआ जी अपना
औ ख़रीदार खड़े ढेर सा पैसा लेकर

सोचता हूँ के मेरी भूख की शिद्दत में कभी
काश आ जाए कोई लिट्टी-ओ-चोखा लेकर

क्या था रंगीन सफ़र जाम भी टकराया था
वैसे निकला था मैं बस थोड़ा सा भूजा लेकर

होने ही चाहिए अश्आर हमेशा हल्के
ताके जाना न पड़े झाड़ में लोटा लेकर

कोई तारीफ़ नहीं कोई मलामत भी नहीं
सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

आईना ठीक ही कहता है के आ जाते हो क्यूँ
आप ग़ाफ़िल जी वही चेहरा बना सा लेकर

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, March 03, 2017

हम बोलेन तौ मुँह लटकाए बइठे हो

पता है का का पीये खाये बइठे हो
यही बदे का यार लजाए बइठे हो

कहै पियक्कड़ दुनिया तौ फिर ठीक अहै
हम बोलेन तौ मुँह लटकाए बइठे हो

इश्क़ जौ करबो तौ कुछ होइहैं रक़ीब भी
आपन दुसमन आप बनाए बइठे हो

दिल दरिया से किहे किनारा हौ तुम और
आँख से मै कै आस लगाए बइठे हो

अच्छा ख़ासा रहेव बियाहे के पहिले
अब जइसै थप्पड़ जड़वाए बइठे हो

होस मा होतेव प्यार केर बातें होतीं
हमैं देखि कै होस गँवाए बइठे हो

ग़ाफ़िल जी मुस्कानौ तुम्हरी है जइसै
चेहरे पै चेहरा चिपकाए बइठे हो

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, January 30, 2017

अगर आ गया, बड़बड़ाता रहेगा

न भुन पाए फिर भी भुनाता रहेगा
तू अपना हुनर आजमाता रहेगा

बड़ा खब्बू टाइप का है यार तू तो
क्या भेजा मेरा यूँ ही खाता रहेगा

बताएगा भी अब के तुझको हुआ क्या
मुहर्रम के या गीत गाता रहेगा

फिसड्डे क्या अपनी फिसड्डी सी रातें
जलाकर जिगर जगमगाता रहेगा?

ये ग़ाफ़िल है कोई इसे रोको वर्ना
अगर आ गया, बड़बड़ाता रहेगा

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, December 29, 2016

तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

न तू बोलेगा तुझको क्या पुराना याद आता है
तो ले मुझसे ही सुन ले मुझको क्या क्या याद आता है

मुझे तो, रंग में आकर तेरा वह ग़ुस्लख़ाने में
फटे से बाँस जैसा सुर मिलाना, याद आता है

जब अपने सह्न की यारो मुझे है घास छिलवानी
तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

कहीं अब मौज़ में आकर लुगाई से न कह देना
के तू मारी थी जो पहला तमाचा याद आता है

तेरी तो तू कहे ग़ाफ़िल मुझे तो अब शबे हिज़्राँ
न कोई और बस इक तू लड़ाका याद आता है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, October 26, 2016

क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

इश्क़ तो यारो मुझे मँहगा पड़ा
वक़्ते वस्लत मैं जो पीकर था पड़ा

देख उसको, क्या हुआ इक चश्म ख़म
क्या कहें किस दर्ज़े का चाटा पड़ा

भूत का मैंने लिया जैसे ही नाम
वह मुआ सूरत में उसकी आ पड़ा

कोई बावर्ची नहीं थे जबके वे
नाम फिर भी मुल्ला दो प्याज़ा पड़ा

था परीशाँ रूसियों से इसलिए
सर जो मुड़वाया तभी ओला पड़ा

चाहता ग़ाफ़िल हूँ शिद्दत से तो, पर
क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, March 21, 2016

मार खानी है बहुत

इसलिए भी दिलसितां की याद आनी है बहुत
जूतियों की मेरे चेहरे पर निशानी है बहुत

और थोड़ी पीऊँगा है गोया कोटा फुल हुआ
वैसे भी घर जाके मुझको मार खानी है बहुत

आप जो हैं प्लेन से तो फिर जहन्नुम दूर क्या
मेरा क्या! है साइकिल वह भी पुरानी है बहुत

आजकल महफ़िल में चाँदी काटते हम रंगबाज़
ताल पे दे ताल शीला पर जवानी है बहुत

पढ़ गया पूरा, मगर ग़ाफ़िल जी कर देना मुआफ़
आपके दीवान में भी लंतरानी है बहुत

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, November 12, 2015

जो हहहहहहहकलाते हैं

हम भी जब तुक से तुक कभी भिड़ाते हैं
बे मानी वाली ही ग़ज़ल बनाते हैं

हमको अच्छी लगती है उनकी बोली
जो हहहहहहहकलाते हैं

पेट सभी का त्यों ही दुखने लगता है
जैसे ही हम अपना कान खुजाते हैं

एक शेर सर्कस से भाग गया जंगल
ठहरो इक बिल्ले को शेर बनाते हैं

हँसने को मुहताज हुए पैसे वाले
कृपा हँसी की उन पर हम बरसाते हैं

सारे होशियार मिलकर हुशियारी की
मुफ़्तै में हमको माला पहनाते हैं

दास कबीरा की आटा चक्की का क्या
गेंहू सँग घुन अब भी ख़ूब पिसाते हैं

आज नहीं मिलने वाली है वाह हमें
शेर वेर हम अपना लेकर जाते हैं

कई चीटियाँ मिल हाथी को चट कर दीं
ग़ाफ़िल जी अब सबको यही बताते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, July 26, 2015

क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

आपके सिम्त आया था क्या देखकर
हूँ मैं हैरान उल्टा हुआ देखकर

आपके मैकदे की हो जो भी सिफ़त
क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

जी मेरा भी नशीला हुआ जा रहा
आपके लड़खड़ाते ये पा देखकर

क्या कहूँ किस कदर होश मेरा गया
आपको होश से लापता देखकर

आपका हो गया आज मुश्ताक़ मैं
आपके मैकशी की अदा देखकर

मर्हबा मर्हबा मर्हबा मर्हबा
मैं रटूं आपका सर फिरा देखकर