Monday, December 20, 2021

कोशिश अपनी है दिल चुराने की (2122 1212 22)

कोई रूठे तो रूठ जाए मगर
कोशिश अपनी है दिल चुराने की

सोचता हूँ के मुस्कुराएँगे जब आप
होगी क्या हालत इस ज़माने की

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, October 25, 2021

मैं वो चाहूँ ही भला क्यूँ जो ज़माना चाहे (2122 1122 1122 22)

जान चाहेगा नहीं जान सा माना चाहे
चाहिए चाहने देना जो दीवाना चाहे

दिल का दरवाज़ा हमेशा मैं खुला रखता हूँ
कोई आ जाए अगर शौक से आना चाहे

मैं नहीं बोलूँगा उसको के बहाए न कभी
अश्क उसके हैं बहा दे जो बहाना चाहे

रोक तो सकता हूँ दर्या की रवानी मैं अभी
रोकूँ पर कैसे उसे जी से जो जाना चाहे

अपनी चाहत भी निराली है जहाँ से ग़ाफ़िल
मैं वो चाहूँ ही भला क्यूँ जो ज़माना चाहे

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, October 01, 2021

नाक भी बाकी रहे मै भी उड़ा ली जाए (2122 1122 1122 22)

थोड़ी शिक़्वों की शराब आपसे पा ली जाए
क्यूँ नहीं ऐसे भी कुछ बात बना ली जाए

आप तो वैसे भी मानेंगे नहीं अपनी कही
क़स्म ली जाए भी तो आपकी क्या ली जाए

कोई तरक़ीब तो निकलेगी ही गर सोचेंगे
नाक भी बाकी रहे मै भी उड़ा ली जाए

इश्क़ की जंग में ऐसा हो तो क्या हो के अगर
तीर चल जाए मगर वार ही खाली जाए

ज़िन्दगी चार ही दिन की है भले ग़ाफ़िल जी
क्यूँ मगर दर से कोई खाली सवाली जाए

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, September 16, 2021

ता'फ़लक़ पर उड़ान है अपनी (2122 1212 22)

आशिक़ी में तो शान है अपनी
हाँ पर आफ़त में जान है अपनी

लोग सुध-बुध गँवा भी सकते हैं
ऐसी तान ऐ जहान है अपनी

पंख हैं पंखुड़ी गुलाब अपने
ता'फ़लक़ पर उड़ान है अपनी

आप लोहा हैं तो नज़र आएँ
आँख पारस की खान है अपनी

होगी दरकार आपको भी कुछ
एक दिल की दूकान है अपनी

जी ज़रर में है गा रहे हैं ग़ज़ल
यूँ भी हस्ती महान है अपनी

राहे उल्फ़त है ग़ाफ़िल और उस पर
जानलेवा थकान है अपनी

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, September 02, 2021

हवा भी ऐसी जो ले ग़र्द-ओ-ग़ुबार चले (1212 1122 1212 22)

चले न तीरे नज़र जब न बेशुमार चले
हमारी सिम्त चले गर तो बार-बार चले

जिसे था आना न आया वो जाने इस बाबत
हम इंतज़ार में ये ज़िन्दगी गुज़ार चले

हुज़ूर साँस भी लूँ क्या हवा के झोंके हैं
हवा भी ऐसी जो ले ग़र्द-ओ-ग़ुबार चले

हम ऐसे हैं के तग़ाफ़ुल न कर सकेंगे कभी
वो कैसे थे के हमें करके दरकिनार चले

न सोगवार हों आप इश्क़ तो हुआ ग़ाफ़िल
भले ही प्यार की बाजी हुज़ूर हार चले

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, August 22, 2021

सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा

अभी तक हो नहीं पाया है गोया ऐसा जादूगर
के दुनिया में है जैसा जो उसे वैसा दिखा देगा
मगर फिर भी, मेरे महबूब का नाम आप मत पूछो
सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, July 01, 2021

इधर है इंसाँ जो पत्थर भी देवता कर दे (1212 1122 1212 22)

करे न इश्क़ मुझे गर वो तो मना कर दे
कोई तो होगा जो नफ़्रत सही पर आकर दे

न यह कहूँगा के वो है तो है वज़ूद मेरा
न यह कहूँगा के बाबत मेरी वो क्या कर दे

ख़ुदा की हद है के रच देगा कोई कोह-ए-संग
इधर है इंसाँ जो पत्थर भी देवता कर दे

हवा में ख़ुश्बू है जी भी है बाग़ बाग़ मेरा
मुझे क़ुबूल हैं ताने वो मुस्कुराकर दे

अजीब दौर है ग़ाफ़िल जी क्या करे कोई
न जाने कौन वफ़ादार कब ज़फ़ा कर दे

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, June 04, 2021

ख़्वाबों में क्यूँ न आज से अक़्सर मिला करें (221 2121 1221 212)

हमको क़ुबूल है के कहा आपका करें
पर चाहिए के आप भी कुछ इस तरह करें

कर तो चुके हैं ख़ुद को हवाले हम आपके
कहिए हुज़ूर आप के हम और क्या करें

रुस्वाइयों से चाहिए हमको नहीं निजात
इतना मगर हो आप ही बाइस हुआ करें

ये हुस्नो इश्क़ के हैं अजीबोग़रीब पेंच
ऐसा है चलिए काम कोई दूसरा करें

ग़ाफ़िल इस अपने वस्ल से दुनिया को रंज़ है
ख़्वाबों में क्यूँ न आज से अक़्सर मिला करें

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, April 20, 2021

पर ये ग़फ़लत मेरी हक़ीक़त है (2122 1212 22)

फ़िक़्रा ये क्या के शानो शौकत है
ये भी इक रंग है ज़ुरूरत है

लोग कहते हैं लत बुरी है यह
पर ये ग़फ़लत मेरी हक़ीक़त है

वर्ना कह देता, हूँ अभी मश्गूल
आप आए हो मुझको फ़ुर्सत है

है नज़ारों में वैसे क्या क्या पर
मेरी नज़रों को आपकी लत है

बिक तो सकता है कोई भी इंसान
इक तबस्सुम ही उसकी क़ीमत है

हुस्न आदत है इश्क़ की यानी
हुस्न यार इश्क़ की बदौलत है

हो चुकी है ग़ज़ल पर इसमें फ़क़त
एक ग़ाफ़िल और उसकी ग़फ़लत है

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, April 12, 2021

आपका हो जाऊँगा (2122 2122 2122 212)

आपकी ख़्वाहिश है तो गोया फ़ना हो जाऊँगा
ऐसे भी पर देखिएगा आपका हो जाऊँगा

आपने ठुकरा दिया इज़्हारे उल्फ़त मेरा गर
क्या बताऊँ आपको मैं फिर के क्या हो जाऊँगा

मंज़िले उल्फ़त की जानिब मेरे हमदम आपके
पावँ तो आगे बढ़ें मैं रास्ता हो जाऊँगा

आपकी हो जाए मेरी सू निगाहे लुत्फ़ भर
देख लेना फ़र्श से मैं अर्श का हो जाऊँगा

ग़ाफ़िल और आशिक़ मिजाज़ ऐसा है गो मुश्किल मगर
याद करिए आप! था मैंने कहा हो जाऊँगा

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, February 20, 2021

जिधर देखो इशारे हो रहे हैं (1222 1222 122)

ये देखो रंग प्यारे हो रहे हैं
अरे! सारे के सारे हो रहे हैं

कोई तो ख़ूबी-ए-नौ आई हममें
जो थे ग़ैर अब हमारे हो रहे हैं

हुआ अच्छा किनारा कर ली किस्मत
हम अब अपने सहारे हो रहे हैं

हरूफ़ अपने गँवा बैठी ज़ुबाँ क्या
जिधर देखो इशारे हो रहे हैं

हैं हम जैसे रहेंगे वैसे ग़ाफ़िल
भले किस्मत के मारे हो रहे हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, February 12, 2021

ग़ज़ल गुनगुनाने के दिन आ रहे हैं

आदाब दोस्तो! ‘‘नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं’’ वाली फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ साहब की ग़ज़ल की ज़मीन पर आप सबकी ख़िदमत में पेश हैं अपने भी चंद ताज़ा अश्आर-

सब उन पर लुटाने के दिन आ रहे हैं
लो दिल के ख़ज़ाने के दिन आ रहे हैं

बहुत हो चुके मौसिमों के बहाने
हुज़ूर आने जाने के दिन आ रहे हैं

बहार आने को है तुम आओ तो माने
के अब मुस्‍कुराने के दिन आ रहे हैं

जो सीखे सलीके मुहब्बत के अब तक
वो फ़न आज़माने के दिन आ रहे हैं

मुहब्बत ने अँगड़ाई ली जी में, शायद
ग़ज़ल गुनगुनाने के दिन आ रहे हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, February 11, 2021

हाँ वो जो छेद है तेरी छत में

ये न कह तू के क्या है उल्फ़त में
लुत्फ़ आता है मुझको इस लत में

जी चुराने को हैं हज़ारों तैयार
अब तो आए कोई हिफ़ाज़त में

कौन है शख़्स वह अगर तू नहीं
जिसके बाइस ये जी है दिक्कत में

कर हिक़ारत के बदले इश्क़ कुबूल
लुत्फ़ जो है तुझे तिज़ारत में

ग़ाफ़िल इक रोज़ लाएगा सैलाब
हाँ वो जो छेद है तेरी छत में

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, January 30, 2021

रही न फ़िक़्र किसी के अब आने जाने की

न बात बीच में आती हो जी लगाने की
तो है पड़ी ही किसे यार आज़माने की

रहा न मैं वो, रहा था जो आज के पहले
रही न फ़िक़्र किसी के अब आने जाने की

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, January 13, 2021

सोचूँ तो सोचता ही रहूँ आप क्या दिए

आदाब!

कहकर के ये तो इश्क़ है कैसा नशा दिए
सोचूँ तो सोचता ही रहूँ आप क्या दिए

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, January 11, 2021

नयी सी ताल पे नचती वही जवानी है

 जाड़ा (11 जनवरी 2021, 10.2AM)
कोई भी साल हो मौसम तो रंग बदलेगा
हर एक उम्र की यारो यही कहानी है
नया सा सुर है मगर गीत है वही अपना
नयी सी ताल पे नचती वही जवानी है
-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, January 05, 2021

ख़ार पर जो गुलाब आता है

हिस्से गोया सराब आता है
लुत्फ़ फिर भी जनाब आता है

या ख़ुदा वाह रे तेरा कर्तब
ख़ार पर जो गुलाब आता है

दिल टँगा हो ख़जूर की टहनी
तो परिंदा भी दाब आता है

दिन में भी आए माहताब मगर
सोने पर ही तो ख़्वाब आता है

फेंको तो झील में बस इक पत्थर
देखो कैसे हुबाब आता है

गो के आता है गुस्सा मुझको भी पर
क्यूँ मैं बोलूँ के सा'ब आता है

रश्क़ इस पर के आए ग़ाफ़िल जब
ग़ुल के ख़ानाख़राब आता है

-‘ग़ाफ़िल’