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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, September 23, 2020

ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में

न यह पूछो के लग जाती है क्यूँकर आग पानी में
ये भी देखो करिश्में होते हैं क्या क्या जवानी में
मुझे होना ही गर था इश्क़ तो उससे हुआ क्यूँ जो
मचलती रहती थी हर सिम्त नानी की कहानी में

-‘ग़ाफ़िल’

(चित्र गूगल से साभार)

Friday, September 11, 2020

वो अगर चाहे मक़ाँ मेरा अभी घर कर दे

है क़ुबूल आज मुझे मोम से पत्थर कर दे
मुझपे रब उसकी मुहब्‍बत की नज़र पर कर दे

मेरे अल्‍लाह मुझे भी तो तसल्ली हो कभी
उसके शाने पे कभी भी तो मेरा सर कर दे

वो जो आतिश है जलाती है मुझे शामो सहर
कोई उसको तो मेरे जिस्‍म से बाहर कर देे

मेरे इज़्हारे मुहब्बत पे लगा अपनी मुहर
वो अगर चाहे मक़ाँ मेरा अभी घर कर दे

ऐ ख़ुदा कैसी है उलझी ये डगर उल्‍फ़त की
अपने ग़ाफ़िल के लिए कोई तो रहबर कर दे

-‘ग़ाफ़िल’