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सोमवार, दिसंबर 08, 2014

बेजा क़रार आया

बहुत तुरपाइयाँ कीं रिश्तों की फिर क्यूँ है ग़ार आया।
तुम्हारी एक मीठी बोल पर बेजा क़रार आया।।

ग़मे-फ़ुर्क़त का जो अहसास था वह फिर भी थोड़ा था,
जो ग़म इस वस्ल के मौसिम में आया बेशुमार आया।

तुम्हारी बेरूख़ी का यह हुआ है फ़ाइदा मुझको,
पसे-मुद्दत मेरा ख़ुद पर यक़ीनन इख़्तियार आया।

सहेजो इशरतों को ख़ुद की जो इक मुश्त हासिल हैं,
मुझे गर लुत्फ़ आया भी कभी तो क़िस्तवार आया।

ऐ ग़ाफ़िल! होश में आ नीमशब में फिर हुई हलचल,
तुझे तुझसे चुराने फिर से कोई ग़मगुसार आया।।

(ग़ार= बड़ा गड्ढा, पसे-मुद्दत=मुद्दत बाद, नीम शब=अर्द्धरात्रि, ग़मगुसार=सहानुभूति रखने वाला)
                                                        -गाफ़िल
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रविवार, दिसंबर 07, 2014

जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं

जब भी मेरी गली से जाते हैं
पाँव उनके भी डगमगाते हैं

जो दीये बुझ चुके थे यादों के
राहे उल्फ़त में जगमगाते है

उनसे क्या आशिक़ी की बातें हों
बात बातों में जो बनाते हैं

आके चुभता हूँ ख़ार सा मैं तो
वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं

ये भी है तर्ज़े क़ातिली ग़ाफ़िल!
जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, दिसंबर 03, 2014

बस वही दूर हुआ जा रहा मंजिल की तरह

मैंने भी चाहा बहुत जिसको जानो दिल की तरह।
दूर हो जाता वही वक़्त पे मंजिल की तरह।।

ज़ुल्फ़े ज़िन्दाँ में हूँ मैं क़ैद एक मुद्दत से,
कोई आ जाये मेरे वास्ते काफ़िल की तरह।

उसकी तीरे नज़र है, रू-ब-रू दिल है मेरा,
पेश आये तो कभी हाय वो क़ातिल की तरह।

उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा मैंने,
अब चले साथ कोई चाहे मुक़ाबिल की तरह।

मेरे अरमानों का ख़ूँ उसकी उंगुलियों के पोर,
क्या जमे ख़ूब ही हिना-ए-अनामिल की तरह।

आज आवारगी-ए-दिल का मेरे सोहरा है,
तेरे कूचे में जो भटके है वो ग़ाफ़िल की तरह।।

(ज़ुल्‍फ़ ज़िन्‍दाँ=ज़ुल्फ़ों का क़ैदखाना, काफ़िल=ज़ामिन, हिना-ए-अनामिल=उँगलियों के सिरों पर की मेंहदी)
                                                                    -ग़ाफ़िल

राम भरोसे ज़िन्दगी

ख़ुद में हैं मश्‌ग़ूल सब किसको किसकी फ़िक्र
राम भरोसे ज़िन्दगी किसका किससे ज़िक्र

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, दिसंबर 01, 2014

चश्मे-साक़ी में जो साग़र हैं तलाशा करते

शामो सुब वो हैं के पत्थर हैं तलाशा करते
वह जो मिल जाय तो इक सर हैं तलाशा करते

हद हुई ताज की भी मरमरी दीवारों पर
बदनुमा दाग़ वो अक्सर हैं तलाशा करते

जानते हैं के वो हम-सों को नहीं मिलते हैं
हम भी पागल से उन्‍हें पर हैं तलाशा करते

ताल सुर बह्र से जिनका है न लेना देना
मंच ऊँचा, वे सुख़नवर हैं तलाशा करते

यार ग़ाफ़िल! क्या सभी रिंद हुए शाइर अब
चश्मे-साक़ी में जो साग़र हैं तलाशा करते

-‘ग़ाफ़िल’

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रविवार, नवंबर 30, 2014

कम तो नहीं हैं

रुख़ यूँ भी सजाने केे हुनर कम तो नहीं हैं
रुख़सार पे अश्कों केे गुहर कम तो नहीं हैं

सैलाब भी हो प्यास भी जिस राहेगुज़र ही
यूँ चश्‍मेख़ुसूसी भी इधर कम तो नहीं हैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, नवंबर 22, 2014

ऐ सुब्ह सबा तेरी अगर मेरे दर आए

ऐ सुब्ह सबा तेरी अगर मेरे दर आए
जाना के दरीचों से गुज़र कर इधर आए

दोस्तो! आज की ख़ुशगवार सुब आप सबको बहुत-बहुत मुबारक हो

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 19, 2014

पी जाइए पर अश्क़ बहाया न कीजिए

इन मोतियों को बे-सबब जाया न कीजिए
पी जाइए पर अश्क़ बहाया न कीजिए
भर जाएंगे ये ज़ल्द इन्हें ढांक के रखिए
ज़ख़्मों को सरे-राह नुमाया न कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, नवंबर 17, 2014

शब्बाख़ैर!

न ग़ाफ़िल हो परीशाँ नाज़नीनों की है यह आदत
के सब ख़्वाबों में मिलती हैं तज़ुर्बेकार कहते हैं

शब्बाख़ैर!

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, नवंबर 07, 2014

हमने देखा है

तेरी जुल्फ़ों में बियाबान हमने देखा है
उसमें उलझा हुआ इंसान हमने देखा है
हमने देखा है सबा कैसे आग भड़काई
और जला किस तरह अरमान हमने देखा है

-‘ग़ाफ़िल’

(चित्र गूगल से साभार)

मंगलवार, नवंबर 04, 2014

वो ज़माना और था

वो ज़माना और था अब ये ज़माना और है।
वो तराना और था अब ये तराना और है।।

यार के जख़्मों को धोया आँसुओं की धार से,
वो दीवाना और था अब ये दीवाना और है।

टूटता था दिल तो बन जाती हसीं इक दास्ताँ,
वो फ़साना और था अब ये फ़साना और है॥

देखते वे ग़ैर-जानिब क़त्ल हो जाते थे हम,
वो निशाना और था अब ये निशाना और है।

मुद्दई तब भी थीं ग़ाफ़िल! ग़ालिबन् नज़रें यही,
वो बहाना और था अब ये बहाना और है।।

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 29, 2014

बड़ी मुश्क़िल से मिलती है

कभी गाहे बगाहे आदतन ग़ाफ़िल से मिलती है
मगर जब भी ये मिलती है हमेशा दिल से मिलती है
अगर ख़ुद नींद आ जाए तो समझो ख़ुद को क़िस्मतवर
ये दौलत इस ज़माने में बड़ी मुश्क़िल से मिलती है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 09, 2014

छुपा ख़ंजर नही देखा

बहुत दिन बाद आप क़द्रदानों की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ छोटी सी एक ताज़ा ग़ज़ल मुलाहिजा फ़रमाएं!

जो हर सर को झुका दे ख़ुद पे ऐसा दर नहीं देखा।
जो झुकने से रहा हो यूँ भी तो इक सर नहीं देखा।।

मज़ा मयख़ाने में उस रिन्द को आए तो क्यूँ आए,
जो साक़ी की नज़र में झूमता साग़र नहीं देखा।

पहुँच जाता कोई वाँ पे जहां ईसा का रुत्बा है,
कोई बिस्तर नहीं छोड़ा के वो बिस्तर नहीं देखा।

लुटेरा क्यूँ कहें उनको चलो यूँ जी को बहला लें
वो मुफ़लिस हैं कभी आँखों से मालोज़र नहीं देखा।

लुटा दिल का ख़जाना ही कोई दिलदार कहलाए,
लुटाकर देखना यारा अभी तक गर नहीं देखा।

क़यामत है के रुख़ भी और निगाहे-लुत्फ़ भी तेरा,
मेरी जानिब ही है गोया जिसे अक्सर नहीं देखा।

ज़रा सी चूक हाए बेसबब मारा गया ग़ाफि़ल
तेरी मासूम आँखों में छुपा ख़ंजर नही देखा।।

-‘ग़ाफ़िल’

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सोमवार, सितंबर 29, 2014

क्या पता तुझको

अँधेरों से जो हमने दुश्मनी की क्या पता तुझको
कभी दिल को जलाकर रौशनी की क्या पता तुझको
तुझे अब क्‍या पता के किन थपेड़ों को सहा हमने
रहे-उल्फ़त में कैसे चाँदनी की क्या पता तुझको

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 17, 2014

कौन पूछे है भला ग़ाफ़िल को अब इस हाल में

वो तअन्नुद आपका हमसे हमेशा बेवजह,
याद आता है बहुत तुझको गंवा देने के बाद।
कौन पूछे है भला ग़ाफ़िल को अब इस हाल में,
आरज़ू-ए-ख़ाम पे सब कुछ लुटा देने के बाद।।

(तअन्नुद=झगड़ना, लड़ाई, आरज़ू-ए-ख़ाम=वह इच्छा जो कभी पूरी न हो, कच्ची इच्छा)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 25, 2014

हो गयी

चाय का प्याला जवानी हो गयी
आज मधुशाला कहानी हो गयी
ख़्वाब में भी आपके आना मुहाल
दोस्ती ऐसी पुरानी हो गयी

शनिवार, जून 21, 2014

चाँद खिला है बस्ती बस्ती मेरे छत पर काली रात

चाँद खिला है बस्ती बस्ती मेरे छत पर काली रात।
मैं क्या जानूं कैसी होती है कोई मतवाली रात।।

अपने हिस्से की लेते तो मुझको उज़्र नहीं होता,
पर यह क्या तुमने तो ले ली मेरे हिस्से वाली रात।

रात चुराकर ऐ तारे जो तीस मार खाँ बनते हो,
दूजा आसमान रच दूँगा होगी जहाँ उजाली रात।

अब के मेरी रात सुहाने सच्चे सपनों वाली है,
तारों! सुबह जान जाओगे हुई तुम्हारी जाली रात।

ग़ाफ़िल को चकमा देकर जो दिल का सौदा करते हो,
दिल के सौदागर क्या जानो क्या होती दिलवाली रात।।

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 05, 2014

चाँद धरती पे ला सको तो जिओ!

चाँद धरती पे ला सको तो जिओ!
दाग़ उसका मिटा सको तो जिओ!
राह में गुल हैं और काँटे भी
गर गले से लगा सको तो जिओ!!

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मई 29, 2014

धोई-धाई सी मक्कारी

ये दुनियाबी बातें लिखना
दिन को लिखना रातें लिखना
लिखना अरमानों की डोली
कैसे मुनिया मुनमुन हो ली
धन्धा-पानी ठंढी-गर्मी
चालाकी हँसती बेशर्मी
मिलन की रातें रोज़ जुदाई
दिल की दिल से हाथापाई
दिनभर ठगना और ठगाना
वादों का मुरझा सा जाना
ग़ाफ़िल है यह दुनियादारी
धोई-धाई सी मक्कारी

बुधवार, अप्रैल 30, 2014

रविवार, अप्रैल 20, 2014

चलो आज फिर वह तराना बनाएं

चलो आज फिर वह तराना बनाएँ
वो गुज़रा हुआ इक ज़माना बनाएँ

वो झुरमुट की छाँव वो दरिया का पानी
बहकती हुई दो जवाँ ज़िन्दगानी
ज़मीं आसमाँ का अचानक वो मिलना
वो मिलकर सँभलना सँभलकर फिसलना
जो गाया कभी था वो गाना बनाएँ
चलो आज फिर वह तराना बनाएँ

वो पच्छिम के बादल का उठना अचानक
ज़मीं का सिहरना सिमटना अचानक
अचानक ही बादल का जमकर बरसना
नये अनुभवों से ज़मीं का सरसना
मधुरस्मरण का ख़जाना बनाएँ
चलो आज फिर वह तराना बनाएँ

मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

दर्द लिक्खूँ मैं या दवा लिक्खूँ

दर्द लिक्खूँ मैं या दवा लिक्खूँ
सूरते-नाज को क्या क्या लिक्खूँ

ख़ुद को देखा न बारहा जिसमें
तेरा चेहरा वो आईना लिक्खूँ

ना मचलने दे ना तड़पने दे
तेरा वादा भी अब सज़ा लिक्खूँ

मैं लगाया मगर चढ़ी ही नहीं
तुझको बेरंग सी हिना लिक्खूँ

-‘ग़ाफ़िल’


रविवार, मार्च 30, 2014

असहयोग आन्दोलन

एक बात बताऊँ कान में! मुझे मेरे बहते लहू को रोकना आसान लगा बनिस्बत मेरे बहते आँसू के, क्योंकि लहू बहने से रोकने में मेरा ख़ुद सहयोग कर रहा था जमकर पर आँसू ज़िद्दी पूरा असहयोग आन्दोलन पर आमादा था

शनिवार, मार्च 29, 2014

क्या खोया? क्या पाया?

        दो सगे भाई थे। दोनों आशिक़ थे। दोनों की अपनी-अपनी मा’शूक़ा थीं। दोनों उनसे बहुत प्यार करते थे और उनकी मा’शूक़ाएं भी उनपर दिलो-जान से न्योछावर थीं। अपने-अपने आशिक़-मा’शूक़ा को देखे बिना किसी के जी में कल न आती थी। न मिलने पर बेचैनी और मिलने पर बिछड़ जाने की बेचैनी क्या बड़े सुहाने दिन गुज़र रहे थे। एक दिन लोगों ने सोचा कि हम शादी क्यों न करके एक दूजे के हो जायें और सारी उम्र साथ ही गुज़ारें, यह छिप-छिपकर मिलना, दुनिया से नज़रें चुराना, ये बेचैनियों के जख़ीरे अब बरदाश्त नहीं। सो अपने-अपने अभिवावकों से प्रेमियों ने बात की और अभिवावकों की सहमति से उन सबकी विधिवत् शादी कर दी गयी। अर्सा पाँच साल से प्रेमीगण बतौर मिंयाँ-बीवी साथ-साथ रह रहे हैं।
        आज अचानक छोटा भाई दौड़ा-दौड़ा बड़े भाई के पास गया। अन्यमनस्क और उद्विग्न छोटे भाई को देखकर बड़े भाई ने कुशल पूछा तो छोटे भाई के मुंह से अनायास यह सवाल निकला- ‘‘भईया हमारी एक एक मा’शूक़ा थी वह वह बीवियों में नहीं दिखती कहां गयी?’’ बड़े भाई ने सवाल को तपाक से लपकते हुए बोला- ‘‘छोटे! पिछले तीन साल से हमें यही सवाल घुन की तरह चाटे जा रहा है जिसका हल मैं नहीं खोज पाया। ऐसा करते हैं चलो फ़क़ीर साहब से पूछते हैं ’’
        फिर दोनों फ़क़ीर साहब कि पास गये और अपना सवाल दुहराया। सवाल सुनकर फ़क़ीर साहब बिना देर लगाए ही बोल उठे कि- ‘‘बच्चा! तुम दोनों की मा’शूक़ा अब बीबियों में तब्दील हो चुकी हैं उसमें मा’शूक़ा न तलाशो, एक ही समय में एक ही औरत बीबी और मा’शूक़ा दोनों नहीं हो सकती इसी तरह पुरुषों पर भी लागू होता है और यही सवाल तो कल तुम्हारी बीवियाँ भी पूछने आई थीं मुझसे। अब आप सब केवल और केवल मिंयाँ-बीवी हो, एक सामाजिक समझौता और उससे मुताल्लिक़ फ़र्ज़ को ख़ुशी-ख़ुशी निभाओ! उम्र यूँ भी कट जाती है।’’
        अब दोनों के सामने सवाल यह है कि क्या खोया? क्या पाया? जिसका हल शायद वे ता’उम्र तलाशते रहें हम उनके सेहतमंद और सुखी शादीशुदा ज़िन्दगी की कामना करते हैं। आमीन।

रविवार, मार्च 23, 2014

एक मौक़ा तो हो तक़दीर आजमाने को

कोई जो देख ले इस रूप के ख़ज़ाने को
न क्यूँ मचल उठे वह शख़्स इसे पाने को
ये और बात है के इखि़्तयार हो के न हो
एक मौक़ा तो हो तक़दीर आजमाने को

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मार्च 15, 2014

जेब भर खाली होगी

यह शहरे-ग़ाफ़िल है अदा भी निराली होगी
वक़्ते-इश्तक़बाल हर ज़ुबान पर गाली होगी

रुख़े-ख़ुशामदी ही खिलखिलाएगा अक्सर
और तो ठीक है पर बात ही जाली होगी

होगी होली भी और हीलाहवाली होगी
भरी दूकान होगी जेब भर खाली होगी

जिसकी दरकार जहां होगा दरकिनार वही
पुश्त में बीवी होगी रू-ब-रू साली होगी

रोज़ होगा सियाह और शब उजाली होगी
दिखेगा सब्ज़ मगर झमकती लाली होगी

नहीं मिसाल और होगा अहले दुनिया में
के क़ैस गोरा होगा लैला ही काली होगी

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 09, 2014

अब आई जान में जान

चलो!
ले दे के गहमी गहमा के बीच
हो ही गया नारी-दिवसावसान
आज पूरा दिन अति सतर्क रहा
मेरा आत्मसम्मान
मित्रों!
सच यह है कि
अब आई जान में जान
क्योंकि
संयोग से
मैं भी हूँ एक नारी-शुदा इंसान