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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, May 17, 2013

अब तो उनको आजमाना चाहिए

अब हमें भी हक़ जताना चाहिए।
अब तो उनको आजमाना चाहिए॥

कब तलक होकर जमाने के रहें,
अब हमें ख़ुद का जमाना चाहिए।

है दीवाना चश्म का ख़ुशफ़ह्म के
चश्म को भी अब दीवाना चाहिए।

दिल है नाज़ुक टूटता है बेखटक,
भीड़ में उसको बचाना चाहिए।

उनके आने का बहाना कुछ न था,
उनको जाने का बहाना चाहिए।

अब तो शायद हो चुकी पूरी ग़ज़ल,
यार ग़ाफ़िल! अब तो जाना चाहिए॥

हाँ नहीं तो!

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Friday, May 10, 2013

भ्रमित, स्तब्ध

आज
चला गया सहसा
अपने पार्श्व अवस्थित कमरे में
जो
मेरी जी से भी प्यारी राजदुलारी का है
जिसे
मैंने कल ही तो बिदा किया है
भ्रमित, स्तब्ध
देखता रहा मैं
सब रो रहे हैं धार-धार
कमरे के दरो-दीवार,
पलंग, बिस्तर, आदमकद आईना
या कि मेरी आँखें

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