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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, June 28, 2018

अहद यह थी के उस ही दम ज़माना छोड़ देना था

मुझे है याद क्या क्या जाने जाना छोड़ देना था;
तेरा हर हाल मुझको आज़माना छोड़ देना था।

है छूट उल्फ़त में नज़रों से फ़क़त, पीने पिलाने की;
ज़रीयन दस्त मै पीना पिलाना छोड़ देना था।

हर आशिक़ को ख़ुदा के बंदे का है मर्तबा हासिल;
अरे यह क्या के उसको कह दीवाना छोड़ देना था।

अगर आए कभी आड़े ज़माना इश्क़ में अपने;
अहद यह थी के उस ही दम ज़माना छोड़ देना था।

रक़ीबों की रहन है क्या इसी बाबत भला मुझको;
तेरे दिल के नगर तक आना जाना छोड़ देना था।

ये माना है नया साथी नया रास्ता नयी मंज़िल;
मगर क्या तज़्रिबा अपना पुराना छोड़ देना था।

समझता रब है ख़ुद को उसको तो ग़ाफ़िल बहुत पहले;
भले कितना भी है वो जाना माना, छोड़ देना था।

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 27, 2018

आ तू भी


💘

तू भी मुझसे खफ़ा है आज के रोज़?
चाँद तारों में जा छुपा तू भी!
क़त्ल मेरा किया है शौक से तो
अब जनाज़ा उठाने आ तू भी!!

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 26, 2018

मेरे अरमाँ तेरी यादों से जब भी बात करते हैं

🦋

कभी हँसकर कभी गाकर कभी जोरों से झुँझलाकर
न जाने बह्र में किस, बात की शुरुआत करते हैं
तबस्सुम और आँसू बाँधते हैं क्या समां उस दम
मेरे अरमाँ तेरी यादों से जब भी बात करते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 19, 2018

खुला खुला सा वो क्या क्या दिखा रहा है मुझे

वो अपने सीने से ऐसे लगा रहा है मुझे
के जैसे ख़्वाब था मैं सच में पा रहा है मुझे

ये हिचकियाँ हैं सनद यह के है कोई तो जो
अभी भी यादों में अपनी बुला रहा है मुझे

सितम तो ये है के जाना था और ही जानिब
मगर कहाँ वो लिए जी में जा रहा है मुझे

कहूँ मैं कैसे के किस तौर ग़मग़ुसार मेरा
मेरा ही अश्के मुक़द्दस पिला रहा है मुझे

दिखाऊँ शीशा ज़माने को किस तरह ग़ाफ़िल
खुला खुला सा वो क्या क्या दिखा रहा है मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, June 17, 2018

और कुछ पी लूँ अभी होश में आने के लिए

याद करने के लिए हो के भुलाने के लिए
छोड़ कर कुछ भी तो जा यार ज़माने के लिए

मिस्ले दुनिया ही है ऐ दोस्त मेरा मैख़ाना
लोग आते ही यहाँ रोज़ हैं जाने के लिए

बस यही शिक़्वे ज़रा चंद मुहर्रम के गीत
और क्या कुछ न रहा मुझको सुनाने के लिए

कोई कुटिया हो के हो कोई महल मरमर का
एक चिंगारी ही काफी है जलाने के लिए

होश में हूँ गो मगर जी तो यही कहता है
और कुछ पी लूँ अभी होश में आने के लिए

खेल जाएगा ये ग़ाफ़िल तू कहे तो जी पर
तेरी उम्मीद तेरा ख़्वाब सजाने के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, June 16, 2018

मुझे भी अपने दीवानों में पर शुमार करे

कभी हो यूँ के कोई मुझसे भी तो प्यार करे
न बार बार किया जाए एक बार करे
गिराए वर्क़ के बरसाए संग मुझ पर वो
मुझे भी अपने दीवानों में पर शुमार करे

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, June 14, 2018

ग़ाफ़िल अब यह भी दिल्लगी है क्या

🤔

सुब्ह तो है ही शाम भी है क्या
बात अपनी के आख़िरी है क्या

कोई बतलाए तो मुझे अक़्सर
आईने में वो खोजती है क्या

लुत्फ़ आया तो पर न जज़्ब हुई
यह कहानी नई नई है क्या

उसके ही हाथ की लकीरों में
किस्मत अपनी भी खो गई है क्या

पा गया था मैं राह में थी पड़ी
सच बता यह सदी तेरी है क्या

कोई हंगामा हो के लुत्फ़ आए
ज़िन्दगी यह भी ज़िन्दगी है क्या

है ख़लिश तो इक अपने ज़ेरे जिगर
ग़ाफ़िल अब यह भी दिल्लगी है क्या

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, June 12, 2018

और कभी तुम आओ

जी में आना हो अगर और कभी तुम आओ
हो न जी को ये ख़बर और कभी तुम आओ

जाँ निसारी में हूँ मशहूर गो पर क्या हो अगर
गुम हो मेरा ये हुनर और कभी तुम आओ

बात यह भी है के फिर होगा भी उस रोज़ का क्या
मैं ही होऊँ न इधर और कभी तुम आओ

क्या हो किस्मत के मेरी पलकें बिछी हों जिस पर
सूनी सूनी हो डगर और कभी तुम आओ

वक़्त ऐसा भी सितम ढाए न मेरे ग़ाफ़िल
हो लुटा दिल का नगर और कभी तुम आओ

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, June 11, 2018

छोड़के जाने वाले!

मुझको मझधार में ऐ छोड़के जाने वाले!
क्या यहाँ कुछ हैं सफ़ीने को बचाने वाले

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, June 09, 2018

जीते के हारे : दो क़त्आ-

🌫️🌫️🚣🌫️🌫️
मुझे इश्क़ मौजों से है तो है, सो अब
कोई भी किनारा न मुझको पुकारे
हूँ मझधार में और बेहद हूँ ख़ुश मैं
गरज़ कुछ नहीं है के पहुँचूँ किनारे

-‘ग़ाफ़िल’
🌫️🌫️🚣🌫️🌫️

💝💝💝💝💝
हुज़ूर आप यूँ मोड़ लेंगे अगर मुँह
तो अफ़साने दम तोड़ देंगे हमारे
हम उल्फ़त की बाज़ी को रक्खेंगे ज़ारी
नहीं फ़र्क़ इससे है जीते के हारे

-‘ग़ाफ़िल’
💝💝💝💝💝

Thursday, June 07, 2018

जी मे लगे न तीर सी वह शाइरी नहीं

जो हो मेरा हो मेरे ही बाबत वही नहीं
यह तो है बस फ़रेब कोई दिल्लगी नहीं

गोया मैं ठीक ठाक हूँ अबके बहार में
हाँ तेरी याद है के जो अब तक गई नहीं

तेरी निग़ाहे लुत्फ़ है ग़ैरों के सिम्त अब
लगता है तुझको मेरी ज़ुरूरत रही नहीं

छूटी तो चार सू से ही गोली ज़ुबान की
मैं ही ज़रा कठोर था मुझको लगी नहीं

हर बार तेरे शह्र की इस भेंड़ चाल से
लगता है ये है आदमी की बस्तगी नहीं

पहले पहल है तू है परीशाँ इसीलिए
शिक़्वा-ए-बेवफ़ाई की मुझको कमी नहीं

ग़ाफ़िल करे तू शामो सहर शाइरी मगर
जी में लगे न तीर सी वह शाइरी नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, June 06, 2018

आज हम लेकिन दोराहे पर मिले

शख़्स कोई शम्स से क्यूँकर मिले
और फिर वह गर लगाकर पर मिले

राह का जिनको हुनर कुछ भी न था
ऐसे ही सब मील के पत्थर मिले

दर्दे दिल मेरा बढ़ाए ही कुछ और
आह इसी ख़ूबी के चारागर मिले

साथ चलना था शुरू से ही हुज़ूर
आज हम लेकिन दोराहे पर मिले

सामना ग़ाफ़िल करेगा किस तरह
तुझसे गर ग़ाफ़िल कोई बेहतर मिले

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, June 04, 2018

सीने के आर पार होता है

मान लूँगा हो कोई भी सूरत
मेरा तू ग़मग़ुसार होता है
तीर नज़रों का छोड़ तो वह जो
सीने के आर पार होता है

-‘ग़ाफ़िल’