Sunday, July 10, 2011

दुबारा हँसके

जैसे मामूल निभाया है दुबारा हँसके
फिर कोई फूल नुमाया है दुबारा हँसके

जुल्फ-ज़िन्दाँ में ही इक उम्र गुज़ारी हमने
फिर कोई जाल बिछाया है दुबारा हँसके

बस अभी दिल के झरोखों की मरम्मत की थी
फिर कोई संग चलाया है दुबारा हँसके

नींंद ही टूटती आयी है रहे बाकी ही ख़्वाब
फिर कोई ख़्वाब दिखाया है दुबारा हँसके

दिले गुमगश्ता की थी फिक़्र कहाँ ग़ाफ़िल को
फिर कोई याद दिलाया है दुबारा हँसके

-‘ग़ाफ़िल’

(मामूल=सामान्यचर्या, नुमाया=द्रष्टव्य, ज़ुल्फ़ जिन्दाँ=ज़ुल्फ़ रूपी कारागार, संग=पत्थर, गुमगश्त:=खोया हुआ)

Saturday, July 02, 2011

चाँदनी भी जलाया करती है

यूँ शबो-रोज़ आया करती है,
याद उसकी रुलाया करती है।
वो मुसाफ़िर हूँ मैं जिसे अक्सर;
चाँदनी भी जलाया करती है।।
                                                       -ग़ाफिल