मैं तेरे चश्म के ज़ेरे- असर नहीं होता।
दिल में पेवस्त जो तीरे- नज़र नहीं होता॥
तेरे कूचे की सिफ़त संगज़ार की सी है,
आता अक्सर जो सफ़र पुरख़तर नहीं होता।
क्यूँ जमाने की है इस मिस्ल हौसला-पस्ती,
या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता।
शम्अ-ए-हुस्न में मेरी तरह लाखों अख़्ग़र,
रोज जलते हैं मग़र कुछ ज़रर नहीं होता।
मुझको बरबाद किया यह शहर रफ़्ता- रफ़्ता,
गोया इल्जाम कभी इसके सर नहीं होता।
इक नज़र देख ले इस सिम्त भले नफ़्रत से,
यूँ भी ग़ाफ़िल पे मिह्रबाँ क़मर नहीं होता॥
(अख़्गर=पतिंगा, क़मर=चाँद)
दिल में पेवस्त जो तीरे- नज़र नहीं होता॥
तेरे कूचे की सिफ़त संगज़ार की सी है,
आता अक्सर जो सफ़र पुरख़तर नहीं होता।
क्यूँ जमाने की है इस मिस्ल हौसला-पस्ती,
या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता।
शम्अ-ए-हुस्न में मेरी तरह लाखों अख़्ग़र,
रोज जलते हैं मग़र कुछ ज़रर नहीं होता।
मुझको बरबाद किया यह शहर रफ़्ता- रफ़्ता,
गोया इल्जाम कभी इसके सर नहीं होता।
इक नज़र देख ले इस सिम्त भले नफ़्रत से,
यूँ भी ग़ाफ़िल पे मिह्रबाँ क़मर नहीं होता॥
(अख़्गर=पतिंगा, क़मर=चाँद)