Thursday, July 21, 2011

या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता

मैं तेरे चश्म के ज़ेरे- असर नहीं होता।
दिल में पेवस्त जो तीरे- नज़र नहीं होता॥

तेरे कूचे की सिफ़त संगज़ार की सी है,
आता अक्सर जो सफ़र पुरख़तर नहीं होता।

क्यूँ जमाने की है इस मिस्ल हौसला-पस्ती,
या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता।

शम्अ-ए-हुस्न में मेरी तरह लाखों अख़्ग़र,
रोज जलते हैं मग़र कुछ ज़रर नहीं होता।

मुझको बरबाद किया यह शहर रफ़्ता- रफ़्ता,
गोया इल्जाम कभी इसके सर नहीं होता।

इक नज़र देख ले इस सिम्त भले नफ़्रत से,
यूँ भी ग़ाफ़िल पे मिह्रबाँ क़मर नहीं होता॥

(अख़्गर=पतिंगा, क़मर=चाँद)
                                                              -ग़ाफ़िल

Wednesday, July 13, 2011

क्यूँ?

क्यूँ अब इस बस्ती में अक्सर हैवान ही पाए जाते हैं?
भोली-भाली सूरत वाले शैतान ही पाए जाते हैं॥

क्यूँ इंसानों की बदहालत बदतर ही होती जाती है?
सतरंगी सपने दिखलाकर नादान नचाए जाते हैं।

उनके मतबख में शाम सरह है गोश्त पके इंसानों का,
सूखी लकड़ी के बदले क्यूँ इंसान जलाये जाते हैं?

क्यूँ ममता रोज़ बिलखती है? क्यूँ भाईचारा मरता है?
इक प्यार की सिसकन के सुर में, क्यूँ गीत सजाये जाते है?

‘ग़ाफ़िल’ यह कैसी अनहोनी यह कैसे बेड़ा ग़र्क़ हुआ
क्यूँ दो कौड़ी की क़ीमत पर ईमान भुनाये जाते हैं?

(मतबख=पाकशाला)

-‘ग़ाफ़िल’