मौत का और तो कोई सबब नहीं होता।
ग़रचे इक शोख नज़र का ग़जब नहीं होता॥
जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?
मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।
हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।
आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।
क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥