Monday, July 25, 2011

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता।
ग़रचे इक शोख नज़र का ग़जब नहीं होता॥

जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?

मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।

हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥
                                                 -ग़ाफ़िल

Saturday, July 23, 2011

नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी

तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।
पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।

'हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।

तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

है इशरते-सुह्बत-ए-हुस्न किस्मतन अता,
'ग़ाफ़िल' भी क्यूँ न मौज मनाये कभी-कभी॥

(रक़ीब=एक ही प्रेमिका के दो प्रेमी आपस में रक़ीब कहलाते हैं, ज़िश्तरू=बदसूरत, इशरत=खुशी)  
                                                                 -ग़ाफ़िल