साथियों! फिर प्रस्तुत कर रहा हूँ एक पुरानी रचना, तब की जब 'बेनज़ीर' की हत्या हुई थी; शायद आप सुधीजन को रास आये-
उनके पा जाने का है ना इनका खो जाने का है।
पाकर खोना, खोकर पाना, सौदा हरजाने का है॥
तिहीदिली वो ठाट निराला दौलतख़ाने वालों का,
तहेदिली वो उजड़ा आलम इस ग़रीबख़ाने का है।
एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।
वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥
(तिहीदिली=हृदय की रिक्तता, तहेदिली=सहृदयता)