आजकल पता नहीं क्यों लिखने से
मन कतराता है...घबराता है
फिर उलझ-उलझ कर रह जाता है
समझ नहीं आता कि
क्या लिखूँ!
कहां से शुरू करूँ और कहां ख़त्म
विचारों का झंझावात जोशोख़रोश से
उड़ा ले जा रहा है
और मैं उड़ता जा रहा हूँ
अनन्त में दिग्भ्रमित सा
न कहीं ओर, न कहीं छोर
पता नहीं है भी कोई
जो पकड़े हो इस पतंग की डोर
यह भी नहीं पता कि मैं कट गया हूँ
या उड़ाया जा रहा हूँ किसी को काटने के लिए
ख़ैर!
जो भी हो
ऊँचाइयां तो छू ही रहा हूँ
और ऊँचे गया तो लुप्त हो जाऊँगा
अनन्त की गहराइयों में
अवन्यभिमुखता पहुँचा तो देगी
अपनी धरती पर जहां हमारी जड़ है
हाँ अगर किसी खजूर पर अटका तो!
वह स्थिति भयावह होगी
फट-फट के टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा
यह दिल वाला पतंग
काल के हाथों नुचता-खुचता खो जाएगा।
घर का न घाट का
ग़ाफ़िल है बाट का
पर यही तो चालोचलन है
आवारापन का उत्कृष्टतम प्रतिफलन है
चलो यही सही
यारों का आदेश सर-आँखों पर
तो
बताओ जी! यह कैसी रही?
बेशिर-पैर, बिना तुक-ताल की कविता
कुछ आपके समझ में आयी!
या आपने अपना अनमोल वक्त और
अक्ल दोनों गंवाई!
मुआफ़ी!
आपका दिमाग़ी ज़रर हो
ऐसा मेरा इरादा भी न था
और याद रहे!
एक ख़ूबसूरत कविता सुनाने का
मेरा वादा भी न था।