Thursday, June 14, 2012

छुपा ख़ंजर नही देखा

बहुत दिन बाद आप क़द्रदानों की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ छोटी सी एक ताज़ा ग़ज़ल मुलाहिजा फ़रमाएं!

जो हर सर को झुका दे ख़ुद पे ऐसा दर नहीं देखा।
जो झुकने से रहा हो यूँ भी तो इक सर नहीं देखा।।

मज़ा मयख़ाने में उस रिन्द को आए तो क्यूँ आए,
जो साक़ी की नज़र में झूमता साग़र नहीं देखा।

लुटेरा क्यूँ कहें उनको चलो यूँ जी को बहला लें
वो मुफ़लिस हैं कभी आँखों से मालोज़र नहीं देखा।

क़यामत है के रुख़ भी और निगाहे-लुत्फ़ेे जाना भी,
मेरी जानिब ही हैंं गोया जिन्हें अक्सर नहीं देखा।

ज़रा सी चूक हाए बेसबब मारा गया ग़ाफ़िल
तेरी मासूम आँखों में छुपा ख़ंजर नही देखा।।

-‘ग़ाफ़िल’

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Wednesday, May 02, 2012

कुछ कुण्डलियाँ-

1-
नारी संग से क्यों डरे, नारी सुख कर धाम।
नारी बिन रघुपतिहुँ कर, होत अधूरा नाम।।
होत अधूरा नाम, कहन मां नाहिं सुहायी,
नारी नर-मन-कलुस पलक मह दूर भगाई,
खिला पुष्प बिन ना सुहाइ जइसै फुलवारी,
ग़ाफ़िल मन बगिया वइसै लागै बिन नारी।।
2-
घर का मुखिया करमठी, रचता नये पिलान।
विकसित हो यह घर सदा बढ़ै मान-सम्मान।।
बढ़ै मान-सम्मान, सबहि मिलि काम करैंगे।
हंसी-खुशी से सबकी झोली रोज़ भरैंगे।
कछुक स्वारथी डारे हैं मन बीच तफ़रका।
ग़फ़िलौ सोचै का होई अब गति यहि घर का।।
3-
बातहिं बात बनाइये, बात बने बनिजात।
देखा बातहिं बात मह, भिश्ती नृपति कहात।।
भिश्ती नृपति कहात, होत दिल्ली कर राजा।
सिक्का चाम चलाइ, बजावत आपन बाजा।
ग़ाफ़िल कहै बिचारि, बैठिहौं पीपल पातहिं।
बात बिगरि जौ जाय, तिहारो बातहिं बातहिं।।
                                                                        -ग़ाफ़िल

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