Monday, January 04, 2016

उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

मुहब्बत जंग है ऐसी के जिस पल हार जाओगे
उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

तुम्हारा मर्तबा क़ायम रहे ये है दुआ मेरी
मगर सच यह भी है के तुम मुझे ही भूल जाओगे

मेरे दर पे न आना है न आओ पर कहो के क्या
तसव्वुर में मेरे आने से ख़ुद को रोक पाओगे

मेरा दामन है कोरा पर मुझे ऐसा लगे है के
जो छूटे ही नहीं वह दाग़ तुम उस पर लगाओगे

मुझे ग़ाफ़िल कहो, पागल या के अलमस्त दीवाना
मैं कबका बन चुका यह सब मुझे अब क्या बनाओगे

लिखा हूँ शे’र दो इक पर मुसन्निफ़ मत समझ लेना
न माने तो मेरे क़िर्दार से धोखा ही खाओगे

बड़ी गुस्ताख़ नज़रें हैं ये ता’ज़ीरात क्या जानें
इन्हें लड़ने से ग़ाफ़िल जी भला क्या रोक पाओगे

(मुसन्निफ़=पद्यकार, ता’ज़ीरात=दण्ड संहिता)

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, January 03, 2016

मुझको न गिला कोई उसको न शिक़ायत है

इस ओर सलासत है उस ओर नज़ाक़त है
फिर भी है क़शिश कुछ जो आपस में मुहब्बत है

होता है कहाँ ऐसा पर इश्क़ में है अपने
मुझको न गिला कोई उसको न शिक़ायत है

उल्फ़त का भला कैसै इज़हार करें उससे
डर है न चली जाए थोड़ी भी जो इज़्ज़त है

चाहे तो बदल डाले हाथों की लकीरों को
तक़्दीर का रोना पर उसकी भी तो आदत है

हर काम सलीके से हो जाए तो क्या कहने
धोखे में नहीं रहना ये रस्मे मुहब्बत है

ग़ाफ़िल के लिए दुनिया दो हर्फ़ ज़रा हँसकर
बोलेगी नहीं हरगिज़ गोया के ज़ुरूरत है

(सलासत=सरलता)

-‘ग़ाफ़िल’