Thursday, February 04, 2016

मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

नहीं है वस्ल किस्मत में मगर यूँ फ़ासिले क्यूँ हैं
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं

तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं

दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं

न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं

ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, February 03, 2016

के हद से गुज़रने को जी चाहता है

शरारों पे चलने को जी चाहता है
के हद से गुज़रने को जी चाहता है

मेरा आज चिकनी सी राहों पे चलकर
क़सम से फिसलने को जी चाहता है

मुझे सर्द आहों की है याद आती
मेरा अब पिघलने को जी चाहता है

क़शिश खींचती है मुझे घाटियों की
के फिर से उतरने को जी चाहता है

तेरे शोख़ दामन में मानिंदे ख़ुश्बू
मेरी जाँ विखरने को जी चाहता है

ग़रज़ के जबीं का न बल हो नुमाया
मेरा भी सँवरने को जी चाहता है

ग़ज़ल सुनके ग़ाफ़िल की बोले तो कोई
के फिर यार सुनने को जी चाहता है

-‘ग़ाफ़िल’