नहीं है वस्ल किस्मत में मगर यूँ फ़ासिले क्यूँ हैं
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं
तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं
दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं
न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं
चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं
ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं
-‘ग़ाफ़िल’
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं
तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं
दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं
न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं
चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं
ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं
-‘ग़ाफ़िल’