Saturday, June 04, 2016

जेवर क़ीमती तक आ गये

नेकियाँ थीं ऑप्शन फिर भी बदी तक आ गये
सामने दर्या था और तुम तिश्नगी तक आ गये

पाँवों की जुम्बिश से तुमको कब रहा है इत्तेफ़ाक़
बात कुछ है चलके जो मेरी गली तक आ गये

क्या किसी की लाश को मिल भी सकी इसकी पनाह
सोचता हूँ फ़ालतू ही तुम नदी तक आ गये

है मेरे अल्लाह का ही सबसे ऊँचा मर्तबा
क्या करोगे इस भुलावे में नबी तक आ गये

कुछ क़दम ही दूर है अब मंज़िले उल्फ़त जनाब
हम सभी उश्शाक़ शे’रो शाइरी तक आ गये

नक़्ल की रौनक़ के आगे पानी भरने को ग़ज़ब
देखिए ग़ाफ़िल जी जेवर क़ीमती तक आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, June 02, 2016

हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

तुह्मत तो आप हम पर थे शौक से लगाए
है दाद बाँटनी तो हम क्यूँ न याद आए

गर इश्क़ हम किये तो फ़र्मा दिए भी सच सच
हम जब भी मात खाए तो इस सबब ही खाए

हुस्नो हसब ही बाइस उसके गुरूर के हैं
पर क्या पड़ी है किसको उसको जो यह बताए

छेड़ा तो इश्क़ का सुर दिल ने हमारे लेकिन
नखरों के उसके चलते वह टूट ही न जाए

शमशान तक ही चाहे जाना तो लाज़िमी है
ज़न्नत किसे मिली है घर बैठे और बिठाए

दुनिया-ए-इश्क़ का भी हो क्या बयान ग़ाफ़िल
हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

-‘ग़ाफ़िल’