Friday, June 10, 2016

दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

जान लो क़त्ल हो गया अपना
नैन उससे अगर मिला अपना

तू ही था अपना पर है ग़ैर का अब
दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

मैक़दा है ये पास आजा अदू
साथ याँ कौन है दिया अपना

अब तलक आलमे बेहोशी है
मुस्कुराकर कोई कहा अपना

हार अपनी कहूँ के जीत कहूँ
जो है जीता वो ख़ास था अपना

शाने महफ़िल है क़स्म से ग़ाफ़िल
शे’र मारा हुआ तेरा अपना

(अदू=दुश्मन)

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, June 06, 2016

किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

बदल जाना तेरा यूँ और उस पर भी फज़ीहत ये
के अब हर पल रक़ीबों से हमारी ही शिक़ायत ये

न करना भूलकर भी भूल हमको कम समझने की
वगरना तुझको लेकर डूब ही जाएगी आदत ये

हमारे पास पहले से बहुत धोखे हैं वैसे भी
इनायत कर तू इतनी अब न कर हम पर इनायत ये

हम अपने चाहने वालों को लेंगे खोज ही इक दिन
पसीना बह रहा है रंग भी लाएगी मेहनत ये

चलो अच्छा हुआ जो हुस्न से है उठ गया पर्दा
नहीं तो झेलता रहता ही जी ता’उम्र ज़िल्लत ये

कहा था कौन ग़ाफ़िल इश्क़ फ़र्माने को बतलाओ
किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

-‘ग़ाफ़िल’