Tuesday, July 12, 2016

हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

दिए क्या भला आज तक ज़िन्दगी को
लगाए नहीं तुम गले गर किसी को

नहीं रोक पाओगे ख़ुद को जो मेरी
तसव्वुर में लाओगे तश्नालबी को

दहल जाएगा दिल तुम्हारा भी बेशक
निहारोगे जब भी मेरी बेबसी को

न डूबा तो क्या लाश मुझको कहोगे
मैं हूँ तैरकर पार करता नदी को

किसी ने किया आज इज़्हारे उल्फ़त
कहूँ तो कहूँ क्या मैं इस दिल्लगी को

अरे यार ग़ाफ़िल न लौटेगी फिर क्या
हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, July 09, 2016

रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

ठेस लग जाती है जिनको बस ज़रा सी बात से
कह रहे हैं वे के हम तो लड़ रहे हालात से

हम परीशाँ हैं के ढकने को बदन, कपड़े नहीं
ख़ुश हैं काफी लोग इज़्ज़त के भी इख़्राजात से

आप तो ऐसे न थे मैं भी हूँ इतना जानता
वज़्ह क्या है डर रहे जो आप मा’मूलात से

चाँद को रोटी बताऐं कम नहीं ऐसे भी लोग
यूँ भी बेहतर खेलते रहते हैं वो जज़्बात से

ताल-सुर और भाव-भाषा, बह्र तक ग़ायब हुई
रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

आप तो शाइर हो ग़ाफ़िल जी वग़ैरह कहिए मत
कोफ़्त होती है बहुत, कुछ ऐसे तंज़ीयात से

{इख़्राजात=व्यय, मा’मूलात= मा’मूल (रोज़मर्रा की सामान्य चर्या) का बहुवचन, तंज़ीयात= तंज़ (व्यंग्य) का बहुवचन}

-‘ग़ाफ़िल’