Thursday, July 14, 2016

मगर सच में तू दम भरता नहीं है

कभी मुझसा कोई कहता नहीं है
मगर कोई मेरी सुनता नहीं है

हज़ारों हैं रहे उल्फ़त में लेकिन
कोई तुमसा मुझे जँचता नहीं है

अरे! तू मुस्कुरा लेता है कैसे
ये ग़ुस्ताख़ी कोई करता नहीं है

यूँ पर्दादारी भी क्या पर्दादारी
दुपट्टा अब तेरा उड़ता नहीं है

बड़े अफ़सोस की है बात अब तू
अदा-ए-शोख़ पर मरता नहीं है

है चर्चे में तेरी वादाखि़लाफ़ी
मगर तू शर्म से गड़ता नहीं है

मसन्निफ़ कम नहीं हैं आज यारो!
हक़ीक़त पर कोई लिखता नहीं है

तुझे मंज़िल तो मिल जाती ही ‘ग़ाफ़िल’
मगर सच में तू दम भरता नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, July 13, 2016

था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

थे कभी तुम भी ग़मग़ुसार ख़ुदा जाने क्यूँ
आज खाए हो तुम्हीं ख़ार ख़ुदा जाने क्यूँ

जल रहा इश्क़ में हूँ फिर भी लगी ये तुह्मत
मैं तुम्हारा हूँ गुनहगार, ख़ुदा जाने क्यूँ

जिस्म तो बिक ही गया रूह भी बिक जाती मगर
था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैंने तो लाख दुहाई दी चढ़ाई क़स्में
तुमसे माना न गया यार ख़ुदा जाने क्यूँ

तुमने भी क्या न सितम ढाया मेरे दिल पे मगर
मैं ही था करता रहा प्यार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैं तो फ़ित्रत से हूँ ग़ाफ़िल ऐ तमन्ना-ए-इश्क़
आह! तुम भी तो गई हार ख़ुदा जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’