Wednesday, July 20, 2016

लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

हो कभी तो वही अपनी ज़िल्लत भी हो
या ख़ुदा इश्क़ ही मेरी ताक़त भी हो

मंज़िले इश्क़ हासिल तो हो जाए गर
उससे इज़्हार की थोड़ी हिम्मत भी हो

है दगाबाज़ पर ग़ौर से देखिए
शायद उसमें ज़रा सी शराफ़त भी हो

यार तारीफ़ केवल उबाऊ लगे
लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

जी को राहत न हो तो भला आपकी
होके होना भी क्या गर इनायत भी हो

एक ‘ग़ाफ़िल’ को फिर और क्या चाहिए
जब दुआ हो, दवा हो, नसीहत भी हो

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, July 19, 2016

ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

अश्कों को रोकता हूँ मैं रुकते मगर नहीं
आतिश हैं वो के आब हैं उनको ख़बर नहीं

इस शह्र के हैं लोग अजब ही ख़याले ख़ाम
दुश्मन भी गर मिले तो मिले मातिबर नहीं

भड़केगी आग और हो जाएगा ख़ाक तू
आतिशजनी से होगा अलग अब भी गर नहीं

पूछें यही सभी के मिलोगे किधर जनाब
मैं कह रहा हूँ जबके मैं रहता किधर नहीं

आती नहीं है नींद के जैसे कहा हूँ मैं
जाना जिधर हो जाए पर आए इधर नहीं

ग़ाफ़िल भी चाहता है के आदत में हो शुमार
ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

-‘ग़ाफ़िल’