Wednesday, December 05, 2018

लगती है राहे ख़ुल्द भी क्यूँ पुरख़तर मुझे

है बाख़बर जताए वो यूँ बेख़बर मुझे
गोया है रू-ब-रू ही बुलाता है पर मुझे

जैसे भी और जो भी मेरा हश्र हो वहाँ
आना है तेरे दर पे सितमगर मगर मुझे

मुट्ठी की रेत और मैं दोनों हैं हममिज़ाज
वैसे ही कोई रोज़ है जाना बिखर मुझे

आया कभी क़मर है भला क्या किसी के हाथ
ढूँढे फिरे हो आप जो शामो सहर मुझे

ग़ाफ़िल जी दर्द देती है शीरीं ज़ुबाँ भी क्या
लगती है राहे ख़ुल्द भी क्यूँ पुरख़तर मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 03, 2018

जो कल थी वही आज है ज़िन्दगी

बड़ी ही कलाबाज है ज़िन्दगी
नुमा तो है पर राज़ है जिन्दगी

अजल तू है मंज़िल ये सच है मगर
कहाँ तेरी मुह्ताज़ है ज़िन्दगी

है बदला ज़ुरूर आज अंदाज़ पर
जो कल थी वही आज है ज़िन्दगी

मुझे नाज़ फिर भी है उस पर बहुत
भले ही दगाबाज है ज़िन्दगी

हक़ीक़त यही है के है ख़ुशनुमा
हुआ क्या जो नासाज है ज़िन्दगी

कोई सुन ले कोई नहीं सुन सके
कुछ ऐसी ही आवाज़ है ज़िन्दगी

जो ग़ाफ़िल हो ख़ुद से कुछ इस तर्ह के
परिंदे की परवाज़ है ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’