शुक्रवार, मई 17, 2013

अब तो उनको आजमाना चाहिए

अब हमें भी हक़ जताना चाहिए।
अब तो उनको आजमाना चाहिए॥

कब तलक होकर जमाने के रहें,
अब हमें ख़ुद का जमाना चाहिए।

है दीवाना चश्म का ख़ुशफ़ह्म के
चश्म को भी अब दीवाना चाहिए।

दिल है नाज़ुक टूटता है बेखटक,
भीड़ में उसको बचाना चाहिए।

उनके आने का बहाना कुछ न था,
उनको जाने का बहाना चाहिए।

शायदन अब हो चुकी पूरी ग़ज़ल,
यार ग़ाफ़िल! अब तो जाना चाहिए॥

हाँ नहीं तो!

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शुक्रवार, मई 10, 2013

भ्रमित, स्तब्ध

आज
चला गया सहसा
अपने पार्श्व अवस्थित कमरे में
जो
मेरी जी से भी प्यारी राजदुलारी का है
जिसे
मैंने कल ही तो बिदा किया है
भ्रमित, स्तब्ध
देखता रहा मैं
सब रो रहे हैं धार-धार
कमरे के दरो-दीवार,
पलंग, बिस्तर, आदमकद आईना
या कि मेरी आँखें

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बुधवार, अप्रैल 17, 2013

एगो टैक्सी छाप गीत-

तोहरे नाक की नथुनिया हमरा जान मारे ली।
तोहरे माथ की चंदनिया हमरा जान मारेली।।

हमरा प्यार से बुलावन, तोहरा दूरि चलिजावन,
झूठै बतिया बनावन, ज़्यादा नख़रा दिखवन,
तोहरी मीठी मुसकनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी चंचल चितवनिया हमरा जान मारेली।

तनवा सरसेला ख़ूब, मनवा हरसेला ख़ूब,
रस बरसेला ख़ूब, लोगवा तरसेला ख़ूब,
तोहरी मधुरी बोलनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी लटलटकनिया हमरा जान मारेली

संझवां छत पर घुमायी, फोन लइकै बतियायी,
ताहरा बाल झटकायी ग़ाफ़िल वइसै बौराई,
मैक्सी की फररर फरकनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी चाल मस्तनिया हमरा जान मारेली।।

हाँ नहीं तो!

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रविवार, अप्रैल 14, 2013

केतना हमके सतइबू हमार सजनी!

चलिए टेस्ट बदलते हैं! प्रस्तुत है एक गीत-

केतना हमके सतइबू हमार सजनी!
कहवाँ हमसे लुकइबू हमार सजनी!!

जउन मन भावै ऊ कहि डारा बतिया,
नाहीं पछितइबू तू सारी-सारी रतिया,
चला जाबै हम होत भिनसार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

कइकै बहाना तू बचि नाहीं पइबू,
पीछा नाहीं छोड़ब हम केतनौ छोड़इबू,
ताना मारौ चाहे हमका हजार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

ग़ाफ़िल चलि जाई त फेरि नाहीं आई,
मानी नाहीं फिर ऊ कउनौ मनाई,
चाहे छूटि जाय पूरा घर-बार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

हां नहीं तो!

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