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शनिवार, सितंबर 10, 2011

सौदा हरजाने का है

साथियों! फिर प्रस्तुत कर रहा हूँ एक पुरानी रचना, तब की जब 'बेनज़ीर' की हत्या हुई थी; शायद आप सुधीजन को रास आये-

उनके पा जाने का है ना इनका खो जाने का है।
पाकर खोना, खोकर पाना, सौदा हरजाने का है॥

तिहीदिली वो ठाट निराला दौलतख़ाने वालों का,
तहेदिली वो उजड़ा आलम इस ग़रीबख़ाने का है।

एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥

(तिहीदिली=हृदय की रिक्तता, तहेदिली=सहृदयता)
                                                                             -ग़ाफ़िल

22 टिप्‍पणियां:

  1. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
    --
    बहुत उम्दा ज़नाब!

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  2. सच ये है किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है...
    http://jan-sunwai.blogspot.com/2010/10/blog-post_4971.html

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  3. उनके पा जाने का है ना इनका खो जाने का है।
    पाकर खोना, खोकर पाना, सौदा हरजाने का है॥

    उम्दा पंक्तियाँ.

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  4. क्या कहना, आपका अंदाज ही सबसे हटकर है।

    एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
    किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

    सुंदर

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  5. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
    शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
    उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥
    खूबसूरत प्रसंग को उभारती बे -बाक प्रस्तुति .हमेशा की तरह असरदार अलफ़ाज़ .गहरे बैठते दिलो दिमाग में .

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  6. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
    ....सच का ही तो लफडा है.... बाकी मुखौटे तो बड़े रोचक हैं

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  7. बहुत खूब ... क्या शेर बयान किए हैं आपने अलग अंदाज़ के ...

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  8. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
    यही तो असली बात है वाह वाह बहुत खूब .....

    उत्तर देंहटाएं
  9. एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
    किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

    बहुत सुन्दर...बहुत बारीक....

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  10. एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
    किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

    वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

    बहुत दिलचस्प ....

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  11. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति |उत्तम शब्द चयन |बधाई
    आशा

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  13. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

    सभी अपने-अपने सच की कैद में हैं।
    अच्छी ग़ज़ल।

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  14. शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
    उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥
    ..बेहतरीन। वैसे तो पूरी गज़ल अच्छी है मगर मुझे इस शेर ने सबसे अधिक प्रभावित किया।

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  15. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

    तथ्यों का अच्छा समावेश... उम्दा ग़ज़ल...
    सादर...

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  16. वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
    पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।
    ....सच है..

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