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शुक्रवार, मार्च 22, 2013

अपलक

रात
सड़क के किनारे
चिल्लाता रहा
वह लहूलुहान
गुज़र रही थी
एक बारात
बैण्डबाजे के शोर में
डूब गयी
उसकी आवाज़
सुबह
सड़क के किनारे
पाई गयी
जमे ख़ून में लिपटी
एक लाश
भीड़ को घूरती
अपलक।

-‘ग़ाफ़िल’

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मंगलवार, मार्च 19, 2013

आग में इस क़दर धुंआ क्या है?

कोई बतला दे के हुआ क्या है?
आग में इस क़दर धुंआ क्या है?

हुस्न वालों की वफ़ा के पीछे
एहतियातन छुपी जफ़ा क्या है?

ज़मीन-ओ-आसमाँ भी मिलते हैं,
आपमें मुझमें फ़ासला क्या है?

उसकी नज़रों की ही इनायत है
फिर दुआ और बद्दुआ क्या है?

न बोले आप अब वक़्ते-रुख़्सत
न पूछूँगा मेरी ख़ता क्या है?

मैं तो ग़ाफ़िल हूँ मगर आप नहीं,
यूँ अदावत का मुद्दआ क्या है?

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.