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मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

दर्द लिक्खूँ मैं या दवा लिक्खूँ

दर्द लिक्खूँ मैं या दवा लिक्खूँ
सूरते-नाज को क्या क्या लिक्खूँ

ख़ुद को देखा न बारहा जिसमें
तेरा चेहरा वो आईना लिक्खूँ

ना मचलने दे ना तड़पने दे
तेरा वादा भी अब सज़ा लिक्खूँ

मैं लगाया मगर चढ़ी ही नहीं
तुझको बेरंग सी हिना लिक्खूँ

-‘ग़ाफ़िल’


6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (16-04-2014) को गिरिडीह लोकसभा में रविकर पीठासीन पदाधिकारी-चर्चा मंच 1584 में "अद्यतन लिंक" पर भी है।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. अजब कशमकश है -क्या छोड़ दूँ और क्या लिक्खूँ !

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  3. बहुत सुन्दर शब्द आदरणीय श्री गाफ़िल साब

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