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Friday, October 12, 2012

रात का सूनापन अपना था

रात का सूनापन अपना था।
फिर जो आया वह सपना था॥

नियति स्वर्ण की थी ऐसी के
उसको भट्ठी में तपना था।

दौरे-तरक्क़ी इंसाँ काँपे
जबकी हैवाँ को कँपना था।

गरदन तो बेजा नप बैठी
दुष्ट दस्त को ही नपना था।

ग़ाफ़िल त्राहिमाम चिल्लाया
गोया राम-नाम जपना था।

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32 comments:

  1. रात की नीरवता की बखूबी कव्यमई रचना ,आभार |

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  2. ग़ाफ़िल त्राहिमाम चिल्लाया
    गोया राम-नाम जपना था।,,,,vaah bhut khoob gafil jee badhaai,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

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  3. एक नए अंदाज़ में अच्छी ग़ज़ल!

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  4. सोने की नीयति ही थी के
    उसको भट्ठी में तपना था।

    बहुत बढ़िया शैर कहा है भाई साहब .कृपया नियति कर लें नीयति को .


    दौरे-तरक्क़ी इंसाँ काँपे
    जबकी हैवाँ को कँपना था।

    बहुत बढ़िया तंज़ है इंतजामात पे .इन्त्जामियत ,इंतजामिया पर .

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    1. राम राम भाई वीरू भाई...आपका बहुत-बहुत आभार...आपके सुझाव को अमल में लाया जा चुका है...शुक्रिया

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  5. gafil trahi mam chillaye,aaj nahi to kal hona tha,gardan to nap gyee abhi, jale pr abhi namak chidkna tha

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  6. बहुत दिनों बाद बढ़िया गजल पढने को मिली -



    गलती करते हाथ हैं, गर्दन लेते नाप ।

    दिल का होय कुसूर पर, नैनों में संताप ।।

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    1. अहा भाई रविकर जी!...आपका बहुत-बहुत शुक़्रिया...आपका टिप्पणी करने का अंदाज़ ही निराला होता है

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  7. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  8. बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...

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  9. दौरे-तरक्क़ी इंसाँ काँपे
    जबकी हैवाँ को कँपना था।
    गरदन तो बेजा नप बैठी
    दुष्ट दस्त को ही नपना था।
    ....ऐसे बुरे वक्त पर रात का सूनापन और भी खलता है
    बहुत खूब!

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  10. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  11. वाह बहुत बढिया

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  12. त्राहिमाम,त्राहिमाम!
    - बरबस मुँह से निकल पड़ता है .

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  13. सुंदर ग़ज़ल ..
    बधाई ग़ाफिल जी

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  14. बहुत ही उम्दा रचना |

    इस समूहिक ब्लॉग में आए और हमसे जुड़ें :- काव्य का संसार

    यहाँ भी आयें:- ओ कलम !!

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  15. दौरे-तरक्क़ी इंसाँ काँपे
    जबकी हैवाँ को कँपना था..बहुत सुन्दर

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  16. बढ़िया प्रस्तुति है .15 अक्तूबर के चर्चा मंच में भ्रष्टाचार की बैसाखियाँ शामिल करने के लिए शुक्रिया .
    रात का सूनापन अपना था।
    फिर जो आया वह सपना था॥

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  17. नियति स्वर्ण की थी ऐसी के
    उसको भट्ठी में तपना था।
    ..lajawab...

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  18. नींद से पहले उसकी याद
    नींद में उसके सपने
    फिर एकाएक जगना
    फिर से उसकी याद और तन्हाइयां
    इसी के साथ रात यूँ ही कट जाती हैं।

    .. सुन्दर प्रस्तुती
    बधाई स्वीकारें।
    साँझा करने के लिए आभार !!!

    मेरी पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा ..
    http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/10/blog-post_17.html

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