Wednesday, April 10, 2013

अब तो आबे-हयात फीके से

हो चुके फ़ाकेहात फीके से।
आज के इख़्तिलात फीके से॥

हसीन मिस्ले-शहर मयख़ाने,
लगते अब घर, देहात फीके से।

साथ साक़ी का हाथ में प्याला,
यूँ तो हर एहतियात फीके से।

बस उसके ख़ाब में मेरा खोना
और हर मा’लूमात फीके से।

चख चुका अब शराबे-लब ग़ाफ़िल,
अब तो आबे-हयात फीके से॥

(फ़ाकेहात=ताज़े हरे मेवे जैसे सेब आदि, इख़्तिलात= चुम्बन आलिंगन आदि, आबे-हयात= अमृत)

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Friday, March 22, 2013

अपलक

रात
सड़क के किनारे
चिल्लाती रही
वह लहूलुहान
गुज़र रही थी
एक बारात
बैण्डबाजे के शोर में
डूब गयी
उसकी आवाज़
सुबह
सड़क के किनारे
पाई गयी
जमे ख़ून में लिपटी
एक लाश
भीड़ को घूरती
अपलक।

-‘ग़ाफ़िल’

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