Saturday, February 06, 2016

मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

सच है यह, तुझसे कोई रिश्ता नहीं
जी तेरे बिन पर कहीं लगता नहीं

है तस्सवुर ही ठिकाना वस्ल का
इश्क़ मुझसा भी कोई करता नहीं

ये भी है तीरे नज़र का ही कमाल
दिल है घाइल उफ़्‌ भी कर सकता नहीं

दर्द है गर तो दवा भी इश्क़ है
इश्क़ सा कुछ और हो सकता नहीं

क्या करोगे आस्तीनों के सिवा
साँप अब दूजी जगह पलता नहीं

घूमता हूँ शह्र की गलियों में पर
मुझको तेरे सा कोई जँचता नहीं

दाद तो ग़ाफ़िल को मिल जाएगी मुफ़्त
मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, February 05, 2016

बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

हर मुहल्ले, हर सड़क पर, हर गली, चारों तरफ़
है तेरा जल्वा, तेरी चर्चा रही चारों तरफ़

आस्माँ पे अब्र भी छाने से कतराने लगे
इस तरह फैली है तेरी रौशनी चारों तरफ़

तुझको मुझसे इश्क़ है ये बात तूने क्यूँ भला
एक बस मुझसे छुपाई औ कही चारों तरफ़

क्यूँ रहे अब धड़कनों पर भी किसी को ऐतबार
बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

ख़ुश बहुत है इश्क़ फिर भी, गो तमाशा बन चुका
हो रही तारीफ़ जो अब हुस्न की चारों तरफ़

रख के शाने पर किसी ग़ाफ़िल के गोली दाग ले
शर्तिया होगी हँसी लेकिन तेरी चारों तरफ़

-‘ग़ाफ़िल’