Monday, April 10, 2017

सच्ची रह पकड़ा सकता है

जी उस पर ही आ सकता है
दिल जो शख़्स गंवा सकता है

बेपरवा सा हुस्न इश्क़ को
बेमतलब तड़पा सकता है

देख के तेरे लब पे तबस्सुम
मेरा ग़ुस्सा जा सकता है

इंसाँ बस मजनू हो जाए
कंकड़ पत्थर खा सकता है

तेरी पेशानी का पसीना
मेरा हसब बता सकता है

जान भी पाया कौन इश्क़ में
क्या खोकर क्या पा सकता है

अब आलिम रब ही ग़ाफ़िल को
सच्ची राह दिखा सकता है

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, April 07, 2017

आईना रंग क्यूँ बदलता है

मान लेना न यह के पक्का है
आदमी आदमी का रिश्ता है

यूँ तो लाखों गिले हैं ज़ेरे जिगर
कौन तेरा है कौन मेरा है

इश्क़ की क्या नहीं है ये तौहीन
दिल सुलगता है और तड़पता है

पुख़्ता हूँ ख़ूब ज़िस्मो जान से मैं
हादिसों से जो मेरा नाता है

न डरेगा भी तो डराएगी
कुछ इसी ही सिफ़त की दुनिया है

देख रुख़ पर मेरे है दाग़ तो क्या
चाँद भी वाक़ई कुछ ऐसा है

गोया होता हूँ मैं वही ग़ाफ़िल
आईना रंग क्यूँ बदलता है

-‘ग़ाफ़िल’